जानिए, क्या है 2026 में मूंग की MSP का वादा और PSS की सीमा ?

MP मूंग Moong Procurement से जुड़ी जानकारी, जिसमें MSP और PSS का अंतर, मूंग खरीदी केंद्र और मध्यप्रदेश में पूरी मूंग खरीदी नहीं होने के कारण बताए गए हैं।

आखिर क्यों नहीं हो सकती MP में मूंग की पूरी खरीदी ?

क्या मूंग की MSP घोषित होने का मतलब सरकार हर किसान की पूरी मूंग खरीदेगी? मध्यप्रदेश में चल रहे Moong Procurement विवाद के बीच यही सबसे बड़ा सवाल बन गया है। दरअसल, Minimum Support Price (MSP) और Price Support Scheme (PSS) को लेकर फैली गलतफहमी ही किसानों और सरकार के बीच टकराव की सबसे बड़ी वजह है। आखिर MSP का वादा क्या है, PSS की सीमा क्या है और मध्यप्रदेश में 100% मूंग खरीदी क्यों संभव नहीं हो पाती? आइए पूरी व्यवस्था को आसान भाषा में समझते हैं।

किसान कल्चर की मूंग पर | विशेष पड़ताल (भाग-2)

भोपाल। आंदोलन कर रहे अधिकांश किसानों का मानना है कि जब केंद्र सरकार मूंग का Minimum Support Price (MSP) घोषित करती है, तो उसकी पूरी फसल उसी कीमत पर खरीदी जानी चाहिए। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि MSP घोषित करना और पूरी उपज खरीदना – दोनों अलग-अलग बातें हैं।

यहीं से शुरू होता है इस पूरे विवाद का सबसे अहम अध्याय।

दरअसल, MP Moong Procurement को लेकर सबसे बड़ा भ्रम MSP और Price Support Scheme (PSS) को लेकर है। यही भ्रम आज किसानों और सरकार के बीच टकराव की सबसे बड़ी वजह बन चुका है।

Moong Procurement और MSP और PSS – दोनों एक नहीं हैं

देश में हर वर्ष केंद्र सरकार 23 प्रमुख फसलों का Minimum Support Price (MSP) घोषित करती है। इसका उद्देश्य किसानों को यह भरोसा देना होता है कि यदि बाजार भाव गिरते हैं, तो उन्हें न्यूनतम मूल्य दिलाने का प्रयास किया जाएगा।

लेकिन दलहन और तिलहन के मामले में केवल MSP घोषित कर देना पर्याप्त नहीं होता।

इन फसलों की सरकारी खरीदी Price Support Scheme (PSS) के तहत होती है, जो PM-AASHA योजना का हिस्सा है।

यानी MSP एक घोषित मूल्य है, जबकि PSS उस मूल्य पर होने वाली सरकारी खरीदी की व्यवस्था है। दोनों का उद्देश्य जुड़ा हुआ है, लेकिन दोनों एक जैसी व्यवस्था नहीं हैं।

Moong Procurement फिर पूरी फसल क्यों नहीं खरीदी जाती?

यही वह सवाल है जो आंदोलन की जड़ में है।

PSS के तहत केंद्र सरकार राज्यों के प्रस्ताव, अनुमानित उत्पादन, उपलब्ध बजट, भंडारण क्षमता और बाजार की स्थिति का आकलन करने के बाद ही खरीदी की मात्रा तय करती है।

इसका मतलब यह है कि MSP घोषित होने के बावजूद सरकार हर किसान की पूरी उपज खरीदने के लिए बाध्य नहीं होती।

यही व्यवस्था किसानों की सबसे बड़ी नाराजगी का कारण है। उनका कहना है कि जब खेती का पूरा निवेश MSP को ध्यान में रखकर किया जाता है, तो बाद में खरीदी सीमित क्यों कर दी जाती है?

Moong Procurement में मध्यप्रदेश को केवल 4.54 लाख MT की मंजूरी क्यों?

इस वर्ष मध्यप्रदेश सरकार ने रिकॉर्ड उत्पादन को देखते हुए केंद्र से बड़े पैमाने पर खरीदी की अनुमति मांगी थी।

लेकिन केंद्र सरकार ने प्रदेश के लिए 4.54 लाख मीट्रिक टन मूंग खरीदने की मंजूरी दी।

राज्य सरकार का तर्क है कि यह मात्रा पर्याप्त नहीं है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और कृषि मंत्री ऐंदल सिंह कंसाना केंद्र से खरीदी सीमा बढ़ाने का अनुरोध कर चुके हैं।

वहीं केंद्र का पक्ष भी अलग है।

केंद्र का कहना है कि देशभर में जितनी मूंग खरीदी की मंजूरी दी गई है, उसका लगभग 87 प्रतिशत हिस्सा अकेले मध्यप्रदेश को मिला है। ऐसे में पहले स्वीकृत लक्ष्य पूरा करने पर जोर दिया जाना चाहिए।

यहीं से केंद्र और राज्य के तर्क आमने-सामने खड़े दिखाई देते हैं।

Moong Procurement: खरीदी की रफ्तार भी सवालों के घेरे में

आंदोलन के बीच एक और दिलचस्प तथ्य सामने आया।

सरकार को जितनी खरीदी की अनुमति मिली है, शुरुआती दौर में उसका भी पूरा उपयोग नहीं हो पाया।

सरकार का कहना है कि खरीदी केंद्र लगातार संचालित हो रहे हैं और किसान धीरे-धीरे उपज लेकर पहुंच रहे हैं।

वहीं किसान संगठनों का दावा है कि बड़ी संख्या में किसानों ने अपनी मूंग रोक रखी है। उन्हें उम्मीद है कि यदि आंदोलन के बाद खरीदी सीमा बढ़ती है, तो वे बाद में MSP पर अपनी उपज बेच सकेंगे।

यानी कम बाजार भाव और भविष्य की उम्मीद के बीच किसान इंतजार की रणनीति अपना रहे हैं।

Moong Procurement में क्या है NAFED और MARKFED की भूमिका?

कई किसानों को लगता है कि राज्य सरकार सीधे MSP पर खरीदी करती है, जबकि वास्तविक व्यवस्था इससे अलग है।

NAFED (National Agricultural Cooperative Marketing Federation of India) केंद्र सरकार की प्रमुख खरीद एजेंसी है।

वहीं मध्यप्रदेश में MARKFED पंजीयन, खरीदी केंद्रों का संचालन, भुगतान समन्वय और स्थानीय व्यवस्थाओं की जिम्मेदारी निभाता है।

यानी खरीदी की पूरी प्रक्रिया में केंद्र और राज्य – दोनों की एजेंसियां मिलकर काम करती हैं। इसलिए किसी भी बड़े निर्णय के लिए दोनों स्तरों पर सहमति जरूरी होती है।

क्या MSP कानूनी गारंटी है?

यह सवाल कई वर्षों से राष्ट्रीय बहस का विषय बना हुआ है।

वर्तमान व्यवस्था में MSP घोषित किया जाता है, लेकिन सभी फसलों की पूरी खरीद की कानूनी बाध्यता नहीं है।

यही वजह है कि जब उत्पादन बढ़ता है और बाजार भाव MSP से नीचे चला जाता है, तो सबसे ज्यादा विवाद दलहन और तिलहन की खरीदी को लेकर सामने आता है।

किसान संगठन लंबे समय से मांग कर रहे हैं कि MSP व्यवस्था को अधिक प्रभावी बनाया जाए, ताकि किसानों को घोषित समर्थन मूल्य से कम कीमत पर उपज बेचने की मजबूरी न रहे।

लेकिन असली संकट अभी सामने आना बाकी है…

  • अब तक की पड़ताल से इतना साफ हो चुका है कि विवाद केवल MSP, PSS या सीमित खरीदी का नहीं है।
  • असल चुनौती वहां शुरू होती है, जहां सरकार खरीदी तो कर लेती है, लेकिन उसे बेच नहीं पाती।
  • पिछले वर्ष खरीदी गई लाखों टन मूंग आज भी सरकारी गोदामों में पड़ी है।
  • चार बार टेंडर निकलने के बावजूद उसका निस्तारण क्यों नहीं हो सका?
  • सरकार की वास्तविक खरीद लागत MSP से कहीं अधिक कैसे पहुंच जाती है?
  • और यदि इस वर्ष 100 प्रतिशत खरीदी कर ली जाए, तो सरकार पर हजारों करोड़ रुपये का अतिरिक्त वित्तीय बोझ क्यों आ सकता है?

इन सभी सवालों का जवाब पढ़िए ‘किसान कल्चर’ की विशेष पड़ताल के भाग-360% मूंग Moong खरीदी: किसान और सरकार को कितना फायदा, कितना नुकसान?” में, जहां हम 100 क्विंटल मूंग के वास्तविक आर्थिक गणित, सरकारी स्टॉक, वित्तीय बोझ और किसानों की आय पर पड़ने वाले प्रभाव का विस्तृत विश्लेषण करेंगे।

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