मूंग पर महासंग्राम : किसान सही या सरकार? MP Moong Procurement, MSP 2026 और राजनीति के बीच फंसा अन्नदाता

मूंग पर महासंग्राम : किसान सही या सरकार?

यही सवाल आज MP Moong (मूंग) Procurement विवाद का केंद्र बन चुका है। पहली नजर में यह किसानों और सरकार के बीच टकराव का मामला लगता है, लेकिन इसकी परतें खोलने पर तस्वीर कहीं अधिक जटिल दिखाई देती है।

भोपाल। मध्यप्रदेश की राजधानी भोपाल इन दिनों केवल सत्ता का केंद्र नहीं, बल्कि किसानों के सबसे बड़े आंदोलन का भी केंद्र बनी हुई है। विधानसभा के मानसून सत्र के तुरंत बाद हजारों किसान राजधानी की सड़कों पर उतर आए हैं। किसी के हाथ में झंडा है, कोई अपनी मूंग की बोरियों की तस्वीर लेकर पहुंचा है, तो कोई सिर्फ एक सवाल पूछ रहा है – “जब सरकार ने मूंग का Minimum Support Price (MSP) घोषित किया है, तो हमारी पूरी फसल उसी कीमत पर क्यों नहीं खरीदी जा रही?”

यही सवाल आज MP Moong Procurement विवाद का केंद्र बन चुका है। पहली नजर में यह किसानों और सरकार के बीच टकराव का मामला लगता है, लेकिन इसकी परतें खोलने पर तस्वीर कहीं अधिक जटिल दिखाई देती है। यह केवल समर्थन मूल्य पर खरीदी का विवाद नहीं, बल्कि कृषि नीति, सरकारी खरीद व्यवस्था, दलहन बाजार, भंडारण क्षमता और हजारों करोड़ रुपये के आर्थिक गणित से जुड़ा हुआ विषय है।

एक ओर किसान हैं, जो MSP को अपनी आय की सुरक्षा मानते हैं। दूसरी ओर सरकार है, जो कह रही है कि खरीद व्यवस्था Price Support Scheme (PSS) के नियमों और केंद्र से मिलने वाली स्वीकृति के दायरे में संचालित होती है। ऐसे में सवाल यह है कि आखिर सही कौन है – किसान या सरकार?

आखिर क्यों शुरू हुआ मूंग के लिए आंदोलन?

पिछले कुछ वर्षों में मध्यप्रदेश ग्रीष्मकालीन मूंग उत्पादन का सबसे बड़ा केंद्र बनकर उभरा है। नर्मदापुरम, हरदा, सीहोर, रायसेन, विदिशा, देवास, शाजापुर, उज्जैन और मालवा-निमाड़ के किसानों ने गेहूं की कटाई के बाद बड़े पैमाने पर मूंग की खेती शुरू की। कम अवधि में तैयार होने वाली इस फसल को सरकार ने भी लगातार प्रोत्साहित किया।

इस वर्ष प्रदेश में मूंग का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ। लेकिन जब फसल मंडियों में पहुंची, तो किसानों की उम्मीदों को बड़ा झटका लगा।

केंद्र सरकार ने वर्ष 2026-27 के लिए मूंग का MSP ₹8,768 प्रति क्विंटल तय किया, जबकि अधिकांश कृषि उपज मंडियों में किसानों को केवल ₹6,000 से ₹6,500 प्रति क्विंटल का भाव मिला। यानी हर क्विंटल पर लगभग ₹2,200 से ₹2,700 का सीधा नुकसान।

यहीं से किसानों का असंतोष सड़क पर उतर आया।

सिर्फ मूंग की MSP बढ़ाना नहीं, और भी है किसानों की मांगे

आंदोलन कर रहे किसानों की मांग केवल MSP बढ़ाने की नहीं है। उनका कहना है कि जब सरकार पहले से समर्थन मूल्य घोषित करती है, तो खरीदी भी उसी के अनुरूप होनी चाहिए।

किसानों की प्रमुख मांगें हैं –

  • MP Moong Procurement के तहत 100 प्रतिशत मूंग की सरकारी खरीदी।
  • सभी पंजीकृत किसानों को खरीदी का अवसर।
  • e-Token प्रणाली में सुधार और पर्याप्त स्लॉट उपलब्ध कराना।
  • खरीदी की समय सीमा बढ़ाना।
  • केंद्र सरकार द्वारा PSS के तहत खरीदी सीमा बढ़ाना।
  • MSP से कम कीमत पर खरीद करने वालों के खिलाफ प्रभावी कार्रवाई।

किसानों का तर्क है कि खेती का पूरा आर्थिक गणित MSP को आधार बनाकर तैयार किया जाता है। यदि फसल तैयार होने के बाद अधिकांश उपज बाजार में कम कीमत पर बेचनी पड़े, तो MSP की घोषणा का लाभ सीमित रह जाता है।

मामला सिर्फ मूंग की MSP का नहीं है

यह आंदोलन केवल किसानों की नाराजगी तक सीमित नहीं है। इसके पीछे कई ऐसे सवाल हैं, जिनका सीधा संबंध देश की कृषि नीति से है।

  • क्या MSP घोषित करने का अर्थ पूरी फसल की सरकारी खरीदी है?
  • क्या राज्य सरकार अपने स्तर पर पूरी मूंग खरीद सकती है?
  • केंद्र केवल सीमित मात्रा में खरीदी की अनुमति क्यों देता है?
  • क्या रिकॉर्ड उत्पादन के साथ मौजूदा खरीद व्यवस्था भी बदलने की जरूरत है?
  • यही वे सवाल हैं, जिन्होंने इस आंदोलन को राजनीतिक और आर्थिक दोनों दृष्टि से महत्वपूर्ण बना दिया है।

गरमाई प्रदेश की राजनीति

मूंग का मुद्दा अब खेत से निकलकर सियासत के केंद्र में पहुंच चुका है।

प्रदेश कांग्रेस ने आंदोलनरत किसानों का समर्थन करते हुए आरोप लगाया है कि MSP घोषित करने के बावजूद किसानों को उसका लाभ नहीं मिल रहा। पूर्व मुख्यमंत्री कमलनाथ ने मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव को पत्र लिखकर खरीदी का दायरा बढ़ाने और किसानों को राहत देने की मांग की है।

दूसरी ओर भाजपा का कहना है कि विपक्ष किसानों की समस्याओं का समाधान खोजने के बजाय आंदोलन को राजनीतिक रंग देने का प्रयास कर रहा है।

यानी अब यह विवाद केवल कृषि का नहीं, बल्कि राजनीति का भी विषय बन चुका है।

जानिए, क्या है सरकार का पक्ष ?

राज्य सरकार का कहना है कि उसने केंद्र सरकार से अतिरिक्त खरीदी की मांग की है।

सरकार के अनुसार इस वर्ष केंद्र ने मध्यप्रदेश को 4.54 लाख मीट्रिक टन मूंग खरीदी की अनुमति दी है, जो देशभर में स्वीकृत कुल मात्रा का लगभग 87 प्रतिशत है। इसके बावजूद रिकॉर्ड उत्पादन को देखते हुए केंद्र से खरीदी सीमा और बढ़ाने का आग्रह किया गया है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने किसान संगठनों से बातचीत के लिए मंत्रियों की समिति भी गठित की है। सरकार का कहना है कि किसानों के हितों की रक्षा उसकी प्राथमिकता है, लेकिन खरीदी व्यवस्था PSS के नियमों के तहत संचालित होती है।

सबसे बड़ा सवाल अभी बाकी है…

  • पहली नजर में किसानों की मांग पूरी तरह उचित लगती है। लेकिन क्या सरकार वास्तव में प्रदेश की पूरी मूंग MSP पर खरीद सकती है?
  • यदि नहीं, तो इसकी सबसे बड़ी बाधा क्या है?
  • क्या केंद्र की Price Support Scheme (PSS) इसकी वजह है?
  • या फिर पिछले वर्षों की सरकारी खरीदी, गोदामों में पड़ा लाखों टन स्टॉक और हजारों करोड़ रुपये का वित्तीय बोझ सरकार के सामने सबसे बड़ी चुनौती बन चुका है?

‘किसान कल्चर’ की विशेष पड़ताल के भाग-2 जानिए, क्या है 2026 में मूंग की MSP का वादा और PSS की सीमा ? में पढ़िए, MSP और PSS में क्या अंतर है, केंद्र केवल 4.54 लाख मीट्रिक टन की मंजूरी क्यों देता है, NAFED और MARKFED की भूमिका क्या है, और आखिर MP Moong Procurement का पूरा ढांचा कैसे काम करता है।

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