100 Quintal Moong के उदाहरण से समझिए, खरीदी का नया गणित
60% मूंग Moong खरीदी का फैसला किसानों के लिए बड़ी राहत माना जा रहा है, लेकिन इससे सरकार की आर्थिक चुनौती भी बढ़ गई है। 100 क्विंटल मूंग के सरल उदाहरण से समझिए कि इस फैसले से किसान की आय में कितना सुधार होगा और सरकारी खजाने पर कितना अतिरिक्त बोझ पड़ सकता है।
किसान कल्चर- विशेष पड़ताल (भाग-3)
Table of Contents
भोपाल। किसान आंदोलन के बाद मध्यप्रदेश सरकार ने बड़ा फैसला लेते हुए मूंग खरीदी की सीमा बढ़ा दी है। पहले जहां केंद्र से मिली अनुमति के आधार पर करीब 4.54 लाख मीट्रिक टन यानी लगभग 25 प्रतिशत उत्पादन तक ही खरीदी संभव थी, वहीं अब राज्य सरकार ने इसे बढ़ाकर अनुमानित उत्पादन का 60 प्रतिशत करने का निर्णय लिया है।यह फैसला किसानों के लिए निश्चित रूप से राहत लेकर आया है, लेकिन क्या इससे पूरी समस्या खत्म हो जाएगी? या सरकार की आर्थिक चुनौती और बढ़ जाएगी?इसी सवाल को 100 क्विंटल मूंग के एक साधारण उदाहरण से समझते हैं।
मूंग Moong का रिकॉर्ड उत्पादन, अब बढ़ी खरीदी की सीमा
इस वर्ष मध्यप्रदेश में ग्रीष्मकालीन मूंग का रिकॉर्ड उत्पादन हुआ है। राज्य सरकार के अनुमान के अनुसार करीब 20 लाख मीट्रिक टन उत्पादन होने की संभावना है।शुरुआत में केंद्र सरकार ने केवल 4.54 लाख मीट्रिक टन खरीदी की अनुमति दी थी, जिससे अनुमानित उत्पादन का लगभग 23-25 प्रतिशत हिस्सा ही MSP पर खरीदा जा सकता था।लेकिन किसान आंदोलन के बाद राज्य सरकार ने खरीदी का दायरा बढ़ाकर उत्पादन का 60 प्रतिशत करने का फैसला किया है। यानी अब करीब 12 लाख मीट्रिक टन तक मूंग MSP पर खरीदी जा सकेगी।इसके बावजूद लगभग 40 प्रतिशत उत्पादन अभी भी खुले बाजार पर निर्भर रहेगा।
उदाहरण से समझिए, 60 फीसदी मूंग Moong खरीद से किसान को कितनी राहत
मान लीजिए किसी किसान ने इस वर्ष 100 क्विंटल मूंग पैदा की। नई व्यवस्था में लगभग 60 क्विंटल मूंग MSP ₹8,768 प्रति क्विंटल पर बिक सकती है, जबकि शेष 40 क्विंटल खुले बाजार में लगभग ₹6,000 से ₹6,500 प्रति क्विंटल के भाव पर बेचनी पड़ सकती है।यदि पूरी 100 क्विंटल मूंग MSP पर बिकती, तो किसान को लगभग ₹8.77 लाख प्राप्त होते।लेकिन वर्तमान व्यवस्था में उसकी कुल आय लगभग ₹7.67 लाख से ₹7.87 लाख के बीच रह सकती है। यानी पहले जहां 25 प्रतिशत खरीदी की स्थिति में किसान को लगभग ₹1.70 से ₹2.10 लाख तक का संभावित नुकसान हो सकता था, वहीं 60 प्रतिशत खरीदी के बाद यह अंतर घटकर लगभग ₹90 हजार से ₹1.10 लाख रह जाता है। स्पष्ट है कि नई व्यवस्था से किसानों को पहले की तुलना में काफी राहत मिलेगी, लेकिन पूरी फसल MSP पर नहीं बिकने से आय का अंतर अभी भी बना रहेगा।
समझिए, मूंग Moong खरीद में क्या है सरकार की चुनौती
किसानों का तर्क अपनी जगह मजबूत है, लेकिन सरकार का पक्ष भी पूरी तरह नजरअंदाज नहीं किया जा सकता।वर्ष 2025 में मध्यप्रदेश में लगभग 3.93 लाख मीट्रिक टन मूंग MSP पर खरीदी गई थी। इस खरीदी पर करीब ₹3,413 करोड़ खर्च हुए और लगभग 1.22 लाख किसानों को लाभ मिला। खरीदी पूरी हुई, भुगतान भी हुआ, लेकिन उसके बाद सबसे बड़ी चुनौती शुरू हुई।
गोदामों में पड़ा है मूंग Moong का लाखों टन स्टॉक
खरीदी के लगभग एक वर्ष बाद भी बड़ी मात्रा में मूंग सरकारी गोदामों में पड़ी हुई है। सरकारी एजेंसियों ने कई बार बिक्री के लिए टेंडर जारी किए, लेकिन अपेक्षित खरीदार नहीं मिले।कारण साफ है। जब खुले बाजार में नई मूंग ₹6,000-6,500 प्रति क्विंटल में उपलब्ध हो, तो व्यापारी अधिक लागत वाला सरकारी स्टॉक क्यों खरीदे? यही वजह है कि खरीदी के बाद स्टॉक की निकासी सरकार के लिए बड़ी चुनौती बनी हुई है।
MSP का खर्चा सिर्फ मूंग Moong खरीद पर ही नहीं, उसके बाद भी कई खर्चें
अक्सर माना जाता है कि सरकार केवल MSP देकर फसल खरीद लेती है, जबकि वास्तविक खर्च इससे कहीं अधिक होता है। सरकारी खरीद के बाद परिवहन, हम्माली, बारदाना, गुणवत्ता परीक्षण, वेयरहाउस, बीमा, ब्याज, रखरखाव और प्रशासनिक खर्च भी जुड़ते हैं। इसी कारण ₹8,768 प्रति क्विंटल MSP पर खरीदी गई मूंग की वास्तविक लागत सरकार के लिए लगभग ₹9,500 प्रति क्विंटल तक पहुंच जाती है। जितने अधिक समय तक स्टॉक गोदामों में रहेगा, लागत उतनी ही बढ़ती जाएगी।
मूंग Moong खरीद के कारण तीन साल में ₹3,346 करोड़ का अनुमानित बोझ
आधिकारिक आकलन के अनुसार वर्ष 2023-24 में मूंग खरीदी पर लगभग ₹971 करोड़, वर्ष 2024-25 में ₹1,048 करोड़ और मौजूदा सीजन में करीब ₹1,327 करोड़ तक के घाटे का अनुमान है। यानी तीन वर्षों में मूंग खरीदी से जुड़ा अनुमानित वित्तीय बोझ ₹3,346 करोड़ तक पहुंच सकता है। अब जब खरीदी का दायरा 60 प्रतिशत तक बढ़ाया गया है, तो यह वित्तीय दबाव और बढ़ने की संभावना से भी इनकार नहीं किया जा सकता, हालांकि इसका वास्तविक आकलन खरीदी की मात्रा, बाजार मूल्य और बाद की बिक्री पर निर्भर करेगा।
क्या मूंग Moong की 100% खरीदी संभव है?
यही इस पूरे विवाद का सबसे कठिन सवाल है। यदि प्रदेश की पूरी अनुमानित 20 लाख मीट्रिक टन मूंग MSP पर खरीदी जाए, तो सरकार को केवल खरीद ही नहीं, बल्कि उसके भंडारण, वित्तपोषण, रखरखाव और बाद में बिक्री की भी व्यवस्था करनी होगी। उपलब्ध सार्वजनिक आंकड़ों और मौजूदा बाजार भाव के आधार पर विशेषज्ञों का अनुमान है कि ऐसी स्थिति में सरकार पर ₹5,400 करोड़ से ₹6,000 करोड़ तक का अतिरिक्त वित्तीय बोझ पड़ सकता है। हालांकि यह कोई आधिकारिक सरकारी अनुमान नहीं, बल्कि उपलब्ध आंकड़ों पर आधारित विश्लेषण है।
सबसे बड़ा सच: मूंग Moong को राहत मिली, लेकिन समाधान अभी बाकी
60 प्रतिशत खरीदी का निर्णय निश्चित रूप से किसानों के लिए पहले से बेहतर स्थिति लेकर आया है। बड़ी संख्या में किसानों को MSP का लाभ मिलेगा और संभावित आय हानि भी काफी कम होगी। लेकिन दूसरी ओर सरकार के सामने खरीदी, भंडारण, वित्तीय प्रबंधन और स्टॉक की बिक्री की चुनौती पहले से बड़ी हो सकती है। यानी विवाद अब केवल “खरीदी हो या न हो” का नहीं रह गया है, बल्कि यह इस बात का है कि खरीदी गई मूंग को समय पर बाजार तक कैसे पहुंचाया जाए और सरकारी व्यवस्था को आर्थिक रूप से टिकाऊ कैसे बनाया जाए।
अब सवाल समाधान का है…
- 60 प्रतिशत खरीदी ने तत्काल राहत तो दे दी है, लेकिन दीर्घकालिक समाधान अभी भी तलाशा जाना बाकी है।
- क्या Price Deficiency Payment (PDP) या भावांतर मॉडल बेहतर विकल्प हो सकता है?
- क्या निजी दाल मिलों, प्रोसेसिंग उद्योग और निर्यात बाजार Export Market को सरकारी खरीद व्यवस्था से जोड़ा जाना चाहिए?
- और क्या भारत की Pulse Procurement Policy में व्यापक सुधार का समय आ गया है?
‘किसान कल्चर’ की विशेष पड़ताल के अंतिम भाग “5 सवाल, एक समाधान: क्यों जरूरी है नई दलहन नीति (New Pulse Policy)” में पढ़िए – देश और दुनिया के मॉडल, संभावित समाधान और वह रास्ता, जिससे किसान और सरकार दोनों की चिंता कम हो सकती है।







Leave a Reply