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रबी सीजन 2026: MP के 22 जिलों में सूखे जैसे हालात का दावा, गेहूं छोड़ सरसों-चने की ओर बढ़ रहे किसान

अक्टूबर 15, 2026
रिपोर्ट: मृदुल जैनKisan Culture
रबी सीजन 2026 में सूखे खेत की मिट्टी जांचता किसान, कम बारिश और सिंचाई संकट का प्रतीकात्मक दृश्य

रबी सीजन 2026 में कमजोर मानसून का असर मध्यप्रदेश के किसानों के फसल चयन पर दिखाई देने लगा है। भारतीय किसान संघ ने प्रदेश के करीब 22 जिलों में सूखे जैसे हालात होने का दावा किया है। देवास के गांवों में किसान गेहूं की जगह सरसों लगाने में रुचि दिखा रहे हैं। कृषि विशेषज्ञों और दाल उद्योग के प्रतिनिधियों का मानना है कि आने वाले महीनों में सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता गेहूं, चना और सरसों की बुवाई का गणित बदल सकती है।

किसान कल्चर, भोपाल: मध्यप्रदेश में रबी की बुवाई से पहले किसानों के सामने इस बार एक बड़ा सवाल खड़ा हो गया है। खेत में गेहूं लगाएं या कम पानी में तैयार होने वाली सरसों और चने जैसी फसलों को प्राथमिकता दें? कमजोर मानसून और सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता को लेकर बढ़ती चिंता के बीच प्रदेश के कुछ इलाकों में खेती का रुझान बदलने लगा है। देवास और उज्जैन क्षेत्र में गेहूं के मुकाबले सरसों की ओर किसानों का झुकाव बढ़ने के शुरुआती संकेत मिले हैं।

किसान कल्चर से विशेष बातचीत में दो कृषि विशेषज्ञों, भारतीय किसान संघ और दाल मिल एसोसिएशन के प्रतिनिधियों ने इस बदलाव के अलग-अलग पहलुओं पर अपनी राय रखी है। भारतीय किसान संघ ने करीब 22 जिलों में सूखे जैसे हालात होने का दावा किया है। वहीं कृषि विशेषज्ञों का कहना है कि किसानों के लिए चुनौती सिर्फ अभी मिट्टी में नमी की नहीं, बल्कि आने वाले महीनों में फसलों को पर्याप्त सिंचाई देने की भी होगी।

एग्रोनॉमिस्ट डॉ. सुरेश मोटवानी ने बताया कि हाल ही में उन्होंने देवास के आठ से दस गांवों का दौरा किया। वहां बड़ी संख्या में किसान सरसों के बीज मांग रहे थे। उनके अनुसार, इन इलाकों में परंपरागत रूप से सरसों की खेती का ज्यादा चलन नहीं रहा है, लेकिन इस बार किसान गेहूं के बजाय कम सिंचाई वाली फसलों में रुचि दिखा रहे हैं।

8 राज्यों में मिट्टी की नमी पिछले 10 साल के औसत से कम

देश के कई प्रमुख कृषि राज्यों में रबी की खेती के लिए मिट्टी की नमी चिंता का विषय बनी हुई है। 15 अक्टूबर को प्रकाशित एक राष्ट्रीय मीडिया रिपोर्ट में सरकारी अधिकारी के हवाले से बताया गया है कि मध्यप्रदेश, महाराष्ट्र, गुजरात, राजस्थान, कर्नाटक, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश और तमिलनाडु में मिट्टी की नमी पिछले दस वर्षों के औसत से नीचे है।

भारतीय मौसम विभाग के आंकड़ों के मुताबिक, देश के निगरानी वाले 741 जिलों में से करीब 58 प्रतिशत में सामान्य से कम या बहुत कम बारिश दर्ज की गई है। बारिश की कमी का असर मिट्टी में उपलब्ध नमी और सिंचाई के लिए पानी के स्रोतों पर पड़ सकता है।

हालांकि, आठ राज्यों में मिट्टी की नमी औसत से कम होने का अर्थ यह नहीं कि इन राज्यों के सभी जिलों में सूखे की स्थिति है। स्थानीय बारिश, मिट्टी की प्रकृति, भूजल और सिंचाई की सुविधा के अनुसार अलग-अलग क्षेत्रों की स्थिति भिन्न हो सकती है।

देश के 36 बड़े जलाशयों में पिछले साल के मुकाबले आधा या उससे कम पानी

रबी सीजन में सिंचाई के लिए जलाशयों की स्थिति भी महत्वपूर्ण होने वाली है। केंद्रीय जल आयोग के आंकड़ों के हवाले से प्रकाशित रिपोर्ट के अनुसार, देश के 36 जलाशयों में उपलब्ध पानी पिछले वर्ष इसी समय दर्ज भंडारण के 50 प्रतिशत या उससे कम है। वहीं 26 जलाशयों में पानी सामान्य भंडारण स्तर के 50 प्रतिशत या उससे कम है।

ये आंकड़े संबंधित जलाशयों के तुलनात्मक भंडारण को दर्शाते हैं। इसका अर्थ यह नहीं कि देश के सभी जलाशय आधे खाली हैं या मध्यप्रदेश के सभी प्रमुख बांधों में पानी आधा रह गया है।

मध्यप्रदेश के लिए यह जानना महत्वपूर्ण होगा कि प्रदेश के प्रमुख बांधों और जलाशयों में कितना उपयोगी पानी उपलब्ध है और उसमें से रबी सीजन के लिए सिंचाई का कितना पानी निर्धारित किया जाएगा।

रबी सीजन 2026 से पहले देश के बड़े जलाशयों में पानी की कमी, सिंचाई संकट और क्षेत्रवार जल भंडारण दिखाता इन्फोग्राफिक
देश के बड़े जलाशयों में पानी की उपलब्धता रबी फसलों की सिंचाई के लिए महत्वपूर्ण है। राष्ट्रीय स्तर पर कई जलाशयों में पिछले साल और सामान्य स्तर की तुलना में कम भंडारण दर्ज हुआ है। (AI द्वारा तैयार प्रतीकात्मक इन्फोग्राफिक)

देवास के 8 से 10 गांवों में सरसों की मांग बढ़ी

एग्रोनॉमिस्ट डॉ. सुरेश मोटवानी के अनुसार, इस रबी सीजन में फसलों के चयन का पैटर्न बदलने की संभावना है। देवास क्षेत्र में यह बदलाव दिखाई देने लगा है।

डॉ. मोटवानी ने किसान कल्चर से कहा, “इस रबी सीजन में फसलों के चयन का पैटर्न बदल सकता है। देवास के आठ से दस गांवों के दौरे में मैंने देखा कि किसान सरसों के बीज मांग रहे हैं। इन इलाकों में पहले सरसों की खेती का ज्यादा चलन नहीं था। गेहूं की आधुनिक किस्मों में चार से छह सिंचाई की जरूरत पड़ सकती है, जबकि सरसों में एक-दो सिंचाई से भी अच्छा उत्पादन मिल सकता है।”

उनके मुताबिक, किसान केवल पानी की उपलब्धता के आधार पर ही फैसला नहीं कर रहे हैं। न्यूनतम समर्थन मूल्य यानी MSP में बदलाव भी किसानों के फसल चयन को प्रभावित कर रहा है। सरसों की बेहतर कीमत मिलने की संभावना किसानों को इस फसल की ओर आकर्षित कर सकती है।

हालांकि, उन्होंने स्पष्ट किया कि गेहूं का वास्तविक रकबा कितना घटेगा, इसका आकलन दिवाली के बाद ही किया जा सकेगा। फिलहाल यह शुरुआती रुझान है, अंतिम बुवाई का आंकड़ा नहीं।

रबी सीजन 2026 में गेहूं की जगह सरसों और चने की खेती का रुझान बढ़ने पर कृषि वैज्ञानिक डॉ. सुरेश मोटवानी की टिप्पणी
कृषि वैज्ञानिक डॉ. सुरेश मोटवानी के अनुसार, पानी की उपलब्धता को देखते हुए देवास और उज्जैन क्षेत्र के किसान गेहूं की जगह सरसों और चने की खेती में रुचि दिखा रहे हैं।

भारतीय किसान संघ का दावा, 22 जिलों में सूखे जैसे हालात

भारतीय किसान संघ के मध्यभारत प्रांत के अध्यक्ष कमल आंजना ने किसान कल्चर से बातचीत में दावा किया कि मध्यप्रदेश के करीब 22 जिलों में सूखे जैसे हालात बने हुए हैं। संगठन ने प्रभावित क्षेत्रों की पहचान कर किसानों को उपलब्ध पानी के अनुसार फसलों का चयन करने की सलाह दी है।

आंजना ने नीमच, मंदसौर, रतलाम, झाबुआ, आलीराजपुर, बुरहानपुर, खरगोन, खंडवा, बड़वानी, इंदौर, देवास, शाजापुर, राजगढ़, हरदा, नर्मदापुरम और बैतूल सहित कई जिलों में पानी की कमी की समस्या बताई।

उनके अनुसार, किसान संघ ने किसानों को सरसों, राईड़ा और तिल्ली जैसी फसलों की बुवाई के लिए प्रोत्साहित किया है। संगठन ने किसानों की मांग के अनुसार बीज उपलब्ध कराने की पहल भी की है।

कमल आंजना ने कहा, “हमने सूखे जैसे हालात वाले क्षेत्रों की पहचान कर ली है। किसानों को कम पानी में तैयार होने वाली फसलें चुनने की सलाह दी गई है और बीज की व्यवस्था भी की है। लेकिन सरकार की ओर से अभी ठोस पहल नहीं हुई है। सबसे बड़ी परेशानी कम सिंचाई में तैयार होने वाली गेहूं की किस्मों के बीज की कमी है।”

उन्होंने दावा किया कि देवास में सरसों के नाम पर नकली बीज बेचे जाने की शिकायतें भी सामने आई हैं। हालांकि, इन शिकायतों की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हो सकी है।

भारतीय किसान संघ के अनुसार, किसानों को कम पानी वाली किस्मों के बीज जुटाने में परेशानी आ रही है। संगठन ने कृषि विभाग के अधिकारियों के साथ अपनी चिंताओं पर चर्चा की है।

रबी सीजन 2026 में मध्यप्रदेश के 22 जिलों में सूखे जैसे हालात और बीज संकट पर भारतीय किसान संघ के अध्यक्ष कमल आंजना की प्रतिक्रिया
मध्यप्रदेश के करीब 22 जिलों में सूखे जैसे हालात होने का दावा करते हुए भारतीय किसान संघ के अध्यक्ष कमल आंजना ने कम पानी वाली फसलों और गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता पर जोर दिया।

अभी मिट्टी में नमी है, असली चुनौती डेढ़ महीने बाद: मृदा वैज्ञानिक

दूसरी ओर, मृदा वैज्ञानिक सुबोध सहस्रबुद्धे का आकलन कुछ अलग है। रिनाटी क्रॉप प्रोटेक्शन प्राइवेट लिमिटेड से जुड़े सहस्रबुद्धे के अनुसार, फिलहाल रबी फसलों की शुरुआती बुवाई के लिए मिट्टी में नमी की कोई बड़ी समस्या नहीं है। लेकिन आने वाले महीनों में सिंचाई के लिए पानी की उपलब्धता चुनौती बन सकती है।

सहस्रबुद्धे ने किसान कल्चर से कहा, “अभी खेतों की तैयारी और रबी फसलों की शुरुआती बुवाई के लिए मिट्टी में नमी है। फिलहाल बड़ी समस्या नहीं है। असली चुनौती एक से डेढ़ महीने बाद सामने आ सकती है, जब फसलों को सिंचाई की जरूरत होगी। आगे पानी की उपलब्धता प्रभावित होने पर गेहूं का रकबा कम और चने का रकबा बढ़ सकता है।”

उनका यह आकलन महत्वपूर्ण है, क्योंकि शुरुआती बुवाई के लिए मिट्टी में नमी होना और पूरी फसल अवधि के दौरान पर्याप्त सिंचाई उपलब्ध रहना दो अलग बातें हैं।

किसी खेत में आज बुवाई के लिए पर्याप्त नमी हो सकती है, लेकिन यदि बाद में पानी नहीं मिला तो फसल की बढ़वार और उत्पादन प्रभावित हो सकता है।

रबी सीजन 2026 में मिट्टी की नमी और भविष्य के सिंचाई संकट पर मृदा वैज्ञानिक सुबोध सहस्रबुद्धे की प्रतिक्रिया
मृदा वैज्ञानिक सुबोध सहस्रबुद्धे के मुताबिक फिलहाल बुवाई के लिए मिट्टी में नमी की बड़ी समस्या नहीं है, लेकिन अगले एक से डेढ़ महीने में सिंचाई की चुनौती सामने आ सकती है।

दिवाली के आसपास मावठे पर टिकी किसानों की उम्मीद: सुरेश अग्रवाल

दाल मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेश अग्रवाल का कहना है कि इस बार कम बारिश के कारण गेहूं का रकबा घट सकता है, जबकि चने की बुवाई बढ़ने की संभावना है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, छत्तीसगढ़, गुजरात, महाराष्ट्र और कर्नाटक जैसे प्रमुख दलहन उत्पादक राज्यों में बारिश की कमी से खेती प्रभावित होने की आशंका है।

सुरेश अग्रवाल ने किसान कल्चर से कहा, “कम बारिश के कारण इस बार रबी सीजन में गेहूं का रकबा घटने और चने का रकबा बढ़ने की संभावना है। मध्यप्रदेश, राजस्थान, महाराष्ट्र, गुजरात, छत्तीसगढ़ और कर्नाटक जैसे प्रमुख कृषि राज्यों में बारिश की कमी का असर दिखाई दे रहा है। गेहूं में पांच से छह सिंचाई की जरूरत पड़ती है, जबकि चना और मसूर अपेक्षाकृत कम पानी में तैयार हो जाते हैं। ऐसे में जिन किसानों के पास पर्याप्त सिंचाई की सुविधा नहीं है, वे गेहूं की जगह चने की बुवाई को प्राथमिकता दे सकते हैं। हालांकि, अभी किसानों की नजर दिवाली के आसपास होने वाले मावठे (बुवाई के समय सर्दियों में होने वाली बारिश) पर टिकी है। यदि तीन से चार इंच बारिश हो जाती है, तो किसानों को बड़ी राहत मिल सकती है और फसल चयन का गणित भी बदल सकता है। फिलहाल तुअर और उड़द के उत्पादन में भी कमी की आशंका है। इसका असर किसानों की आमदनी के साथ दाल उद्योग और बाजार पर भी पड़ सकता है।”

अग्रवाल के मुताबिक, बारिश की मात्रा के साथ उसका सही समय पर होना भी महत्वपूर्ण है। यदि फसल को जरूरत के समय पानी नहीं मिलता, तो बाद में होने वाली बारिश से पूरी भरपाई नहीं हो पाती। इससे पौधों की बढ़वार और दानों के आकार तथा वजन पर असर पड़ सकता है।

उन्होंने कहा कि उत्पादन में कमी केवल किसानों का मामला नहीं है। दलहन की कम पैदावार से दाल मिलों को कच्चा माल मिलने में परेशानी हो सकती है और बाजार में कीमतों पर भी दबाव बढ़ सकता है।

रबी सीजन 2026 में गेहूं का रकबा घटने और चने की बुवाई बढ़ने की संभावना पर दाल मिल एसोसिएशन के अध्यक्ष सुरेश अग्रवाल का बयान

गेहूं का रकबा घटने की आशंका, कितना होगा बदलाव?

राष्ट्रीय स्तर पर भी कुछ रबी फसलों के बुवाई क्षेत्र में कमी की आशंका जताई जा रही है। सुरेश अग्रवाल ने कुछ फसलों का रकबा 25 से 30 प्रतिशत तक घटने की संभावना व्यक्त की है।

हालांकि, यह उद्योग प्रतिनिधि का अनुमान है, किसी सरकारी एजेंसी का आधिकारिक पूर्वानुमान नहीं। इसे मध्यप्रदेश में गेहूं के रकबे में निश्चित 25 से 30 प्रतिशत कमी के रूप में नहीं देखा जाना चाहिए।

अग्रवाल और कृषि विशेषज्ञों की राय में एक महत्वपूर्ण समानता है। सभी मानते हैं कि पानी की उपलब्धता इस बार किसानों के फसल चयन को प्रभावित कर सकती है। हालांकि बदलाव कितना होगा, यह आने वाले दिनों में बारिश, सिंचाई और वास्तविक बुवाई की स्थिति से स्पष्ट होगा।

प्रदेश में गेहूं, चना और सरसों की वास्तविक बुवाई के आंकड़े आने के बाद ही पता चल सकेगा कि किसानों ने इस बार फसल चयन में कितना बदलाव किया है।

कम पानी वाली गेहूं की किस्मों के बीज भी नहीं मिल रहे

कम बारिश और संभावित सिंचाई संकट के बीच गुणवत्तापूर्ण बीज की उपलब्धता भी किसानों के लिए समस्या बन सकती है।

कमल आंजना के अनुसार, कम सिंचाई में तैयार होने वाली गेहूं की कुछ किस्मों के बीज आसानी से उपलब्ध नहीं हो रहे हैं। किसान आपस में संपर्क कर दूसरे क्षेत्रों से बीज मंगाने की कोशिश कर रहे हैं।

यदि किसान गेहूं के बजाय सरसों या चने की खेती का क्षेत्र बढ़ाते हैं, तो इन फसलों के प्रमाणित बीज की मांग भी बढ़ सकती है। ऐसे में कृषि विभाग के सामने समय पर सही किस्मों के बीज उपलब्ध कराने की चुनौती होगी।

नकली या गलत किस्म के बीज मिलने से किसानों को आर्थिक नुकसान उठाना पड़ सकता है। इसलिए किसानों को अधिकृत विक्रेताओं से ही बीज खरीदने और बिल, पैकेट तथा बैच नंबर सुरक्षित रखने की जरूरत है।

क्या किसानों को गेहूं छोड़कर चना या सरसों बो देना चाहिए?

कम बारिश और पानी की कमी की आशंका का अर्थ यह नहीं कि सभी किसानों को गेहूं की बुवाई छोड़ देनी चाहिए।

फसल का चुनाव खेत की मिट्टी, उपलब्ध नमी, सिंचाई के साधन, बुवाई का समय और स्थानीय मौसम के अनुसार करना चाहिए।

गेहूं की पानी की जरूरत उसकी किस्म, मिट्टी और मौसम पर निर्भर करती है। वहीं चना और सरसों अपेक्षाकृत कम सिंचाई में उगाई जा सकती हैं, लेकिन इन फसलों के लिए भी सही समय पर पर्याप्त नमी जरूरी है।

जिन किसानों के पास सुनिश्चित सिंचाई की सुविधा है, उनकी स्थिति पूरी तरह बारिश पर निर्भर किसानों से अलग हो सकती है। इसलिए फसल बदलने से पहले स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विभाग के विशेषज्ञों की सलाह लेना उपयोगी होगा।

सरकार के सामने पानी, बीज और किसानों को सही सलाह देने की चुनौती

मध्यप्रदेश में रबी सीजन के आने वाले सप्ताह महत्वपूर्ण होंगे। सबसे पहले यह स्पष्ट करना जरूरी होगा कि किन क्षेत्रों में बुवाई और बाद की सिंचाई के लिए पानी की कमी हो सकती है।

दूसरी चुनौती कम पानी में तैयार होने वाली उपयुक्त फसलों के प्रमाणित बीज समय पर उपलब्ध कराना है। तीसरी चुनौती किसानों तक जिलेवार मौसम, मिट्टी की नमी और सिंचाई की जानकारी पहुंचाना है।

कृषि विशेषज्ञों और दाल उद्योग के प्रतिनिधियों के आकलन बताते हैं कि इस बार पानी की उपलब्धता किसानों के फसल चयन पर असर डाल सकती है। देवास में सरसों के बीज की बढ़ती मांग इसका शुरुआती संकेत है। दूसरी ओर, मृदा वैज्ञानिक सुबोध सहस्रबुद्धे का कहना है कि फिलहाल शुरुआती बुवाई के लिए नमी उपलब्ध है, इसलिए आगे की सिंचाई को लेकर भी तैयारी जरूरी है।

अब किसानों की नजर आने वाले दिनों के मौसम और मावठे पर रहेगी। बारिश हुई तो फसल चयन का गणित बदल सकता है। यदि पानी की कमी बनी रही तो गेहूं की तुलना में चना और दूसरी कम सिंचाई वाली फसलों का रकबा बढ़ सकता है। वास्तविक तस्वीर बुवाई के सरकारी आंकड़े सामने आने के बाद ही स्पष्ट होगी।

रबी सीजन 2026 में आठ राज्यों में मिट्टी की नमी कम होने, 36 जलाशयों में जल भंडारण घटने और बुवाई पर संभावित असर का इन्फोग्राफिक
रबी सीजन 2026 में देश के आठ प्रमुख कृषि राज्यों में मिट्टी की नमी दस साल के औसत से कम है। वहीं 36 जलाशयों में पानी पिछले वर्ष इसी अवधि के स्तर का आधा या उससे कम है। स्रोत: The Economic Times, 15 अक्टूबर 2026।