5 सवाल, एक समाधान: क्यों जरूरी है नई दलहन नीति (New Pulse Policy)

मूंग विवाद पर आधारित प्रीमियम फीचर इमेज, जिसमें किसान, संसद भवन, मूंग की फसल और नई दलहन नीति (New Pulse Policy) की जरूरत को दर्शाया गया है।

किसान कल्चर विशेष पड़ताल (भाग-4)

मध्यप्रदेश में 20.16 लाख मीट्रिक टन अनुमानित मूंग उत्पादन, किसान की 60 प्रतिशत उपज खरीदने की घोषणा, MSP और बाजार भाव में ₹2,000 से ₹2,700 प्रति क्विंटल का अंतर और तीन वर्षों में ₹3,346 करोड़ का अनुमानित वित्तीय बोझ। ‘किसान कल्चर’ की चार भागों की विशेष पड़ताल बताती है कि केवल सरकारी खरीद बढ़ाना पर्याप्त नहीं होगा। किसानों और सरकार, दोनों के हितों के लिए अब नई दलहन नीति (New Pulse Policy) की जरूरत पहले से कहीं अधिक महसूस की जा रही है।

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नई दलहन नीति (New Pulse Policy) क्यों बनी सबसे बड़ी जरूरत?

भोपाल। किसान आंदोलन के बाद मध्यप्रदेश सरकार ने किसानों की मूंग का 60 प्रतिशत हिस्सा न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदने की घोषणा कर तत्काल विवाद को शांत कर दिया। इसके साथ स्लॉट बुकिंग की तारीख बढ़ाई गई और ई-टोकन व्यवस्था में भी राहत दी गई। इससे किसानों को तत्काल राहत तो मिली, लेकिन इस पूरे विवाद ने एक बड़ा सवाल भी खड़ा कर दिया—क्या हर बार आंदोलन के बाद खरीदी का दायरा बढ़ाना ही समाधान है या अब देश को नई दलहन नीति (New Pulse Policy) की जरूरत है?

‘किसान कल्चर’ की चार भागों की इस विशेष पड़ताल में एक बात स्पष्ट होकर सामने आई है कि न किसान पूरी तरह गलत हैं और न सरकार की आर्थिक चिंताएं निराधार हैं।

किसानों का तर्क है कि जब सरकार मूंग का MSP ₹8,768 प्रति क्विंटल घोषित करती है, तो उन्हें उसी कीमत पर पूरी उपज बेचने का अवसर मिलना चाहिए। दूसरी ओर सरकार का कहना है कि सरकारी खरीदी के बाद स्टॉक की निकासी, भंडारण और वित्तीय बोझ लगातार बढ़ रहा है। यही वजह है कि तीन वर्षों में मूंग खरीदी से जुड़े अनुमानित घाटे का आंकड़ा ₹3,346 करोड़ तक पहुंच गया है।

यानी यह विवाद केवल MP Moong Procurement का नहीं, बल्कि देश की नई दलहन नीति (New Pulse Policy) और खरीद व्यवस्था पर पुनर्विचार का विषय बन चुका है।

मूंग आंदोलन का सबसे बड़ा सवाल यही है कि जब सरकार MSP घोषित करती है, तो फिर किसानों को बाजार में उससे कम कीमत पर फसल क्यों बेचनी पड़ती है?

दरअसल, MSP घोषित होने का अर्थ यह नहीं है कि पूरी उपज उसी कीमत पर खरीदी जाएगी। दलहन की खरीद Price Support Scheme (PSS) के तहत होती है, जिसमें खरीदी की सीमा तय होती है।

इस वर्ष मध्यप्रदेश में ग्रीष्मकालीन मूंग की बुवाई करीब 14.30 लाख हेक्टेयर में हुई। औसत उत्पादकता 1,410 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर के आधार पर उत्पादन लगभग 20.16 लाख मीट्रिक टन रहने का अनुमान है।

शुरुआत में केंद्र सरकार ने लगभग 4.54 लाख मीट्रिक टन खरीदी की मंजूरी दी थी। यानी अनुमानित उत्पादन का लगभग 23 प्रतिशत हिस्सा ही MSP पर खरीदा जा सकता था। किसान आंदोलन के बाद राज्य सरकार ने खरीदी का दायरा बढ़ाकर किसानों की उपज का 60 प्रतिशत करने की घोषणा की।

फिर भी लगभग 40 प्रतिशत उत्पादन खुले बाजार पर निर्भर रहेगा, जहां मूंग के भाव कई मंडियों में ₹6,000 से ₹6,500 प्रति क्विंटल तक रहे। यानी MSP और बाजार भाव के बीच ₹2,268 से ₹2,768 प्रति क्विंटल का अंतर बना रहा।

यही वजह है कि विशेषज्ञों का मानना है कि केवल MSP घोषित कर देना पर्याप्त नहीं है। किसानों तक वास्तविक लाभ पहुंचाने के लिए नई दलहन नीति (New Pulse Policy) के तहत खरीद और मूल्य सुरक्षा की व्यवस्था पर पुनर्विचार करना होगा।

सवाल-2: क्या नई दलहन नीति (New Pulse Policy) में 100% सरकारी खरीदी संभव है?

किसानों की सबसे बड़ी मांग है कि सरकार पूरी मूंग MSP पर खरीदे।

पहली नजर में यह मांग पूरी तरह उचित दिखाई देती है, लेकिन व्यवहारिक स्तर पर इसके सामने कई चुनौतियां हैं।

सरकारी खरीद केवल MSP का भुगतान नहीं होती। इसके बाद परिवहन, हम्माली, बारदाना, गुणवत्ता परीक्षण, वेयरहाउस, बीमा, ब्याज, रखरखाव और बाद में बिक्री का पूरा खर्च सरकार को उठाना पड़ता है।

वर्ष 2025 में मध्यप्रदेश में करीब 3.93 लाख मीट्रिक टन मूंग MSP पर खरीदी गई थी। इस खरीदी पर लगभग ₹3,413 करोड़ खर्च हुए और करीब 1.22 लाख किसानों को लाभ मिला।

लेकिन खरीदी के बाद बड़ी मात्रा में मूंग सरकारी गोदामों में पड़ी रही। कई बार टेंडर जारी होने के बावजूद अपेक्षित खरीदार नहीं मिले क्योंकि बाजार में नई मूंग कम कीमत पर उपलब्ध थी।

यही कारण है कि सरकारी आकलन के अनुसार वर्ष 2023-24 में लगभग ₹971 करोड़, वर्ष 2024-25 में ₹1,048 करोड़ और मौजूदा सीजन में लगभग ₹1,327 करोड़ तक का वित्तीय बोझ अनुमानित है। यानी तीन वर्षों में यह आंकड़ा ₹3,346 करोड़ तक पहुंच सकता है।

यदि सरकार पूरी 20.16 लाख मीट्रिक टन मूंग खरीदती है, तो केवल MSP भुगतान ही लगभग ₹17,600 करोड़ से अधिक होगा। इसमें भंडारण, परिवहन और अन्य संचालन व्यय शामिल नहीं हैं।

यानी नई दलहन नीति (New Pulse Policy) बनाते समय केवल किसानों की आय नहीं, बल्कि सरकारी वित्तीय क्षमता और खरीद के बाद की व्यवस्था को भी समान महत्व देना होगा।

सवाल-3: क्या 60% खरीदी के बाद नई दलहन नीति (New Pulse Policy) की जरूरत खत्म हो जाएगी?

सरकार द्वारा 60 प्रतिशत खरीदी की घोषणा निश्चित रूप से किसानों के लिए राहत लेकर आई है।

यदि किसी किसान ने 100 क्विंटल मूंग पैदा की है, तो अब लगभग 60 क्विंटल MSP ₹8,768 प्रति क्विंटल पर बिक सकेगी। शेष 40 क्विंटल उसे बाजार में बेचनी होगी।

पूरी 100 क्विंटल उपज MSP पर बिकती तो किसान को लगभग ₹8.77 लाख प्राप्त होते। लेकिन वर्तमान व्यवस्था में उसकी कुल आय लगभग ₹7.67 लाख से ₹7.87 लाख के बीच रह सकती है।

यानी पहले की तुलना में किसान की स्थिति बेहतर हुई है, लेकिन MSP का पूरा लाभ अभी भी नहीं मिल पा रहा है।

दूसरी ओर सरकार के सामने चुनौती और बढ़ गई है। जितनी अधिक खरीद होगी, उतना अधिक भंडारण, वित्तपोषण और स्टॉक प्रबंधन करना होगा।

यानी 60 प्रतिशत खरीदी तत्काल राहत का फैसला है, लेकिन यह अपने आप नई दलहन नीति (New Pulse Policy) का विकल्प नहीं बन सकती। यदि खरीद के साथ प्रोसेसिंग, बाजार, निर्यात और स्टॉक प्रबंधन की व्यवस्था मजबूत नहीं हुई, तो आने वाले वर्षों में यही समस्या फिर सामने आ सकती है।

सवाल-4: नई दलहन नीति (New Pulse Policy) के लिए गेहूं, कपास और सोयाबीन से क्या सीख मिलती है?

मूंग विवाद का समाधान खोजने के लिए केवल दलहन क्षेत्र को देखने से बात पूरी नहीं होगी। देश की अन्य प्रमुख कृषि उपज की खरीद व्यवस्था बताती है कि हर फसल के लिए एक जैसी नीति सफल नहीं हो सकती। यही कारण है कि विशेषज्ञ नई दलहन नीति (New Pulse Policy) को बहु-आयामी बनाने की बात कर रहे हैं।

गेहूं का मॉडल: खरीद के साथ मजबूत वितरण व्यवस्था

गेहूं और धान में सरकार बड़े पैमाने पर MSP पर खरीद करती है। इसका सबसे बड़ा कारण यह है कि खरीदे गए अनाज की खपत का स्पष्ट तंत्र मौजूद है। भारतीय खाद्य निगम (FCI) और राज्य एजेंसियां गेहूं खरीदकर सार्वजनिक वितरण प्रणाली (PDS), प्रधानमंत्री गरीब कल्याण अन्न योजना और अन्य कल्याणकारी योजनाओं के माध्यम से उसका वितरण करती हैं।

यानी यहां केवल खरीद नहीं, बल्कि खरीद से लेकर अंतिम उपभोक्ता तक पहुंचाने की पूरी व्यवस्था पहले से मौजूद है।

सबक: यदि दलहन में भी सरकारी खरीद बढ़ानी है, तो पहले उसके वितरण और उपयोग का स्थायी तंत्र विकसित करना होगा। नई दलहन नीति (New Pulse Policy) में इस पहलू को शामिल करना अनिवार्य होगा।

कपास का मॉडल: जरूरत पड़ने पर सरकारी हस्तक्षेप

कपास में बाजार भाव MSP से नीचे आने पर Cotton Corporation of India (CCI) किसानों से खरीद करती है। लेकिन कपास की सबसे बड़ी ताकत उसका विशाल टेक्सटाइल उद्योग है, जो सरकारी खरीद के अलावा भी बड़ी मात्रा में कपास की खपत करता है।

यानी सरकार यहां बाजार का विकल्प नहीं, बल्कि सुरक्षा कवच बनती है।

सबक: दलहन में भी सरकार को स्थायी खरीदार बनने के बजाय जरूरत पड़ने पर हस्तक्षेप करने वाली व्यवस्था विकसित करनी चाहिए। नई दलहन नीति (New Pulse Policy) में सरकार और निजी क्षेत्र की साझेदारी महत्वपूर्ण भूमिका निभा सकती है।

सोयाबीन का मॉडल: हर बोरी खरीदना जरूरी नहीं

मध्यप्रदेश देश का सबसे बड़ा सोयाबीन उत्पादक राज्य है। यहां अधिकांश उपज निजी व्यापार, तेल मिलों और प्रोसेसिंग उद्योग के माध्यम से खप जाती है। जब कीमतों में भारी गिरावट आती है, तब सरकार Price Deficiency Payment Scheme (PDPS) जैसे विकल्प अपनाती है।

इस व्यवस्था में सरकार पूरी फसल खरीदने के बजाय MSP और बाजार भाव के अंतर की भरपाई करती है।

मान लीजिए MSP ₹8,768 प्रति क्विंटल है और किसान को बाजार में ₹6,500 मिलते हैं, तो सरकार ₹2,268 का अंतर सीधे किसान के खाते में दे सकती है।

सबक: यदि इसे पारदर्शी तरीके से लागू किया जाए, तो नई दलहन नीति (New Pulse Policy) में यह मॉडल सरकारी भंडारण और वित्तीय बोझ दोनों को कम कर सकता है।

सवाल-5: नई दलहन नीति (New Pulse Policy) में क्या-क्या बदलाव जरूरी हैं?

विशेषज्ञों का मानना है कि यदि भविष्य में मूंग, उड़द, मसूर और चना जैसी दलहनों में बार-बार विवाद नहीं चाहते, तो नई दलहन नीति (New Pulse Policy) में कम से कम पांच बड़े सुधार आवश्यक होंगे।

1. उत्पादन के साथ बाजार की अग्रिम योजना

किस जिले में कितनी दलहन बोई गई है, इसका रियल टाइम आकलन हो। उसी के आधार पर खरीद, भंडारण और बाजार की तैयारी पहले से हो।

2. PSS और PDPS का मिश्रित मॉडल

जहां बाजार मजबूत है, वहां भावांतर भुगतान (PDPS) और जहां बाजार कमजोर है, वहां MSP आधारित खरीद (PSS) लागू की जाए।

3. दाल प्रसंस्करण उद्योग को बढ़ावा

मध्यप्रदेश देश का सबसे बड़ा ग्रीष्मकालीन मूंग उत्पादक राज्य बन चुका है, लेकिन उत्पादन के अनुपात में दाल प्रसंस्करण उद्योग नहीं बढ़ पाया। यदि नई दाल मिलें, फूड प्रोसेसिंग यूनिट और वैल्यू एडिशन उद्योग विकसित होंगे, तो सरकारी खरीद पर निर्भरता घटेगी।

4. Export Market का विस्तार

भारतीय मूंग की गुणवत्ता अंतरराष्ट्रीय बाजार में बेहतर मानी जाती है। यदि निर्यात नीति स्थिर रहे और गुणवत्ता मानकों पर काम हो, तो किसानों के लिए अतिरिक्त बाजार तैयार किया जा सकता है।

5. e-Token और डिजिटल खरीद व्यवस्था में सुधार

इस आंदोलन में बड़ी शिकायत e-Token व्यवस्था को लेकर भी रही। नई दलहन नीति (New Pulse Policy) में रियल टाइम स्लॉट बुकिंग, डिजिटल ट्रैकिंग और पारदर्शी खरीद व्यवस्था शामिल की जानी चाहिए।

एक समाधान: नई दलहन नीति (New Pulse Policy)

चार भागों की इस विशेष पड़ताल का निष्कर्ष किसी एक पक्ष को सही या गलत ठहराना नहीं है।

किसान इसलिए परेशान हैं क्योंकि रिकॉर्ड उत्पादन के बावजूद उन्हें MSP का पूरा लाभ नहीं मिल पाता।

सरकार इसलिए चिंतित है क्योंकि जितनी अधिक खरीद होती है, उतना ही अधिक भंडारण, वित्तपोषण और स्टॉक प्रबंधन का बोझ बढ़ता है।

यानी असली समस्या किसान बनाम सरकार नहीं, बल्कि उत्पादन, बाजार, सरकारी खरीद और मूल्य संरक्षण के बीच संतुलन की है।

ऐसे में नई दलहन नीति (New Pulse Policy) केवल एक नई योजना नहीं, बल्कि दलहन क्षेत्र के लिए दीर्घकालिक सुधार का रोडमैप बन सकती है।

सवाल सिर्फ मूंग खरीदी का नहीं, देश की कृषि नीति का है

मूंग आंदोलन ने यह साबित कर दिया कि रिकॉर्ड उत्पादन अपने आप किसानों की समृद्धि की गारंटी नहीं है।

यदि उत्पादन बढ़ता रहे, बाजार कमजोर रहे और सरकारी खरीद हर वर्ष विवाद का विषय बने, तो यही स्थिति भविष्य में उड़द, मसूर और चना जैसी अन्य दलहनों में भी दोहराई जा सकती है।

इसलिए अब समय केवल MSP बढ़ाने या खरीदी का प्रतिशत तय करने का नहीं, बल्कि नई दलहन नीति (New Pulse Policy) बनाने का है, जिसमें उत्पादन, खरीद, भंडारण, प्रोसेसिंग, निर्यात और मूल्य संरक्षण को एकीकृत दृष्टिकोण से देखा जाए।

यदि केंद्र और राज्य सरकारें इस दिशा में व्यापक नीति सुधार करती हैं, तो मध्यप्रदेश का यह मूंग विवाद भविष्य में पूरे देश के लिए एक महत्वपूर्ण नीति सुधार का आधार बन सकता है।

नई दलहन नीति (New Pulse Policy) पर आधारित मध्यप्रदेश मूंग खरीदी इन्फोग्राफिक। 20.16 लाख मीट्रिक टन उत्पादन, 60% खरीदी, MSP ₹8,768 प्रति क्विंटल, बाजार भाव, सरकारी खरीद और ₹3,346 करोड़ वित्तीय बोझ के प्रमुख आंकड़े।
मध्यप्रदेश में मूंग उत्पादन, MSP, 60% खरीदी, सरकारी खर्च और नई दलहन नीति (New Pulse Policy) की जरूरत से जुड़े प्रमुख आंकड़े एक नजर में।

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