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नरवाई प्रबंधन: जिस नरवाई को जला रहे किसान, वही बन सकती है खेत के लिए फायदेमंद! जानें 5 उपाय

रिपोर्ट: प्राजंली पातुरकरसंपादन: डॉ. सुदीप शुक्लKisan Culture
नरवाई प्रबंधन और जैविक खेती को लेकर भोपाल में किसान संगठनों के साथ आयोजित बैठक

नरवाई प्रबंधन को लेकर भोपाल जिला प्रशासन ने किसानों को जागरूक करने की पहल की है। कलेक्टर प्रियंक मिश्रा ने किसान संगठनों से अपील की है कि वे गांवों में जाकर किसानों को फसल अवशेष जलाने के नुकसान बताएं और जैविक खेती अपनाने के लिए प्रेरित करें। नरवाई जलाने से मिट्टी के उपयोगी सूक्ष्मजीवों और पोषक तत्वों को नुकसान पहुंच सकता है, जबकि फसल अवशेषों का सही प्रबंधन खेती की लागत कम करने तथा मिट्टी की सेहत सुधारने में मददगार हो सकता है।

किसान कल्चर, भोपाल: गेहूं, धान और दूसरी फसलों की कटाई के बाद खेत में बची नरवाई को आग लगाना अगली फसल की तैयारी का आसान तरीका लग सकता है, लेकिन यह मिट्टी की सेहत और पर्यावरण के लिए नुकसानदेह साबित हो सकता है। इसी समस्या को लेकर भोपाल जिला प्रशासन ने किसान संगठनों के माध्यम से जागरूकता बढ़ाने की पहल की है। कलेक्टर प्रियंक मिश्रा ने किसान संगठनों से कहा है कि वे किसानों को नरवाई नहीं जलाने, फसल अवशेषों का सही उपयोग करने और जैविक खेती के तरीके अपनाने के लिए प्रेरित करें।

कलेक्ट्रेट सभाकक्ष में कलेक्टर प्रियंक मिश्रा की अध्यक्षता में किसान संगठनों के प्रतिनिधियों की बैठक आयोजित की गई। बैठक में फसल अवशेष जलाने से वायु प्रदूषण, मिट्टी की उर्वरता और खेती की उत्पादकता पर पड़ने वाले प्रभावों पर चर्चा हुई।

विभागीय जानकारी के अनुसार, कलेक्टर ने कहा कि किसान संगठनों को गांवों में किसानों के बीच जागरूकता अभियान चलाना चाहिए। उन्होंने आधुनिक कृषि उपकरणों, पूसा डीकंपोजर और फसल अवशेषों के वैज्ञानिक प्रबंधन जैसे विकल्पों के प्रति किसानों को जागरूक करने पर जोर दिया।

नरवाई प्रबंधन क्यों जरूरी, खेत में आग लगाने से क्या नुकसान?

फसल कटाई के बाद खेत में बचने वाले डंठल, पत्तियां और अन्य अवशेष अगली फसल की तैयारी में किसानों के सामने चुनौती बन जाते हैं। कई किसान समय और संसाधनों की कमी के कारण इन अवशेषों को जलाने का रास्ता अपनाते हैं।

लेकिन नरवाई जलाने से मिट्टी की ऊपरी सतह अत्यधिक गर्म हो सकती है। इससे सतह के पास मौजूद उपयोगी सूक्ष्मजीव प्रभावित होते हैं। फसल अवशेषों में मौजूद कुछ महत्वपूर्ण पोषक तत्व भी जलने और उत्सर्जन के कारण नष्ट हो सकते हैं।

खेत में आग लगाने से धुआं और प्रदूषक गैसें निकलती हैं, जो आसपास के वातावरण की गुणवत्ता को प्रभावित करती हैं। आग फैलने की स्थिति में दूसरी फसलों, पेड़ों और कृषि संसाधनों को भी नुकसान पहुंच सकता है।

इसके विपरीत, फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन करने से उन्हें मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने और कृषि संसाधन के रूप में इस्तेमाल करने के अवसर मिलते हैं।

नरवाई प्रबंधन: नरवाई नहीं जलाएं, किसान अपना सकते हैं ये 5 तरीके

फसल अवशेषों को जलाने के बजाय किसान अपनी फसल, खेत की स्थिति और उपलब्ध संसाधनों के अनुसार कई विकल्प अपना सकते हैं।

1. पूसा डीकंपोजर का इस्तेमाल

पूसा डीकंपोजर एक सूक्ष्मजीवी उत्पाद है, जो अनुकूल परिस्थितियों में फसल अवशेषों के अपघटन में सहायता करता है। इसका इस्तेमाल निर्धारित विधि और कृषि विशेषज्ञों के मार्गदर्शन में करना चाहिए। अपघटन की अवधि खेत की नमी, तापमान और अवशेषों की स्थिति पर निर्भर करती है।

2. मल्चर मशीन से अवशेषों का प्रबंधन

मल्चर की मदद से खेत में मौजूद डंठलों और दूसरे फसल अवशेषों को छोटे टुकड़ों में काटकर फैलाया जा सकता है। इससे अवशेषों को खेत में बनाए रखने और आगे उनका प्रबंधन करने में आसानी होती है।

3. हैप्पी सीडर और सुपर सीडर का उपयोग

उपयुक्त परिस्थितियों में हैप्पी सीडर या सुपर सीडर जैसी मशीनों से खेत में मौजूद फसल अवशेषों का प्रबंधन करते हुए अगली फसल की बुवाई की जा सकती है। मशीन का चयन पिछली फसल, अवशेषों की मात्रा और खेत की स्थिति के अनुसार करना चाहिए।

4. फसल अवशेषों से कम्पोस्ट खाद

नरवाई और दूसरे जैविक अवशेषों का उपयोग कम्पोस्ट तैयार करने में किया जा सकता है। इसमें गोबर तथा अन्य जैविक सामग्री को निर्धारित विधि से मिलाकर खाद तैयार की जाती है। अच्छी तरह तैयार कम्पोस्ट मिट्टी में जैविक पदार्थ बढ़ाने में सहायक हो सकती है।

5. मल्चिंग और दूसरे उपयोग

उपयुक्त फसल अवशेषों को मिट्टी की सतह पर मल्च के रूप में इस्तेमाल किया जा सकता है। इससे कुछ परिस्थितियों में नमी संरक्षण और खरपतवार प्रबंधन में मदद मिलती है। अवशेषों की गुणवत्ता और स्थानीय सुविधाओं के अनुसार बायोमास जैसे दूसरे उपयोग भी संभव हैं।

हालांकि, सभी तरीके हर खेत के लिए समान रूप से उपयुक्त नहीं होते। किसानों को कृषि विशेषज्ञों की सलाह के अनुसार अपनी जरूरतों के लिए सही विकल्प चुनना चाहिए।

नरवाई प्रबंधन के 5 तरीके, पूसा डीकंपोजर, मल्चर, हैप्पी सीडर, कम्पोस्ट और मल्चिंग से मिट्टी की सुरक्षा
नरवाई जलाने से मिट्टी की सेहत और पर्यावरण को नुकसान हो सकता है। किसान पूसा डीकंपोजर, मल्चर, हैप्पी सीडर, कम्पोस्ट और मल्चिंग जैसे विकल्प अपना सकते हैं। (इंफोग्राफिक: किसान कल्चर)

नरवाई प्रबंधन: नरवाई जलाने के बजाय अपनाएं ये 5 तरीके, मिट्टी की सेहत भी रहेगी बेहतर

जैविक खेती से मिट्टी की उर्वरता कैसे बढ़ सकती है?

भोपाल जिला प्रशासन ने नरवाई प्रबंधन के साथ जैविक खेती के प्रति जागरूकता बढ़ाने पर भी जोर दिया है।

जैविक खेती में गोबर खाद, कम्पोस्ट, जैविक पदार्थों तथा उपयुक्त फसल चक्र जैसी विधियों का महत्व है। इनका संतुलित उपयोग मिट्टी में जैविक कार्बन बढ़ाने और उसकी संरचना सुधारने में मदद कर सकता है।

मिट्टी में पर्याप्त जैविक पदार्थ होने से उसकी पानी सोखने और नमी बनाए रखने की क्षमता बेहतर हो सकती है। इसके अलावा मिट्टी में जैविक गतिविधियां और कुछ पोषक तत्वों की उपलब्धता भी प्रभावित होती है।

हालांकि, जैविक खेती से लाभ फसल, मिट्टी की स्थिति, प्रबंधन और स्थानीय मौसम पर निर्भर करते हैं। इसलिए किसानों को किसी एक विधि को सभी समस्याओं का समाधान मानने के बजाय वैज्ञानिक मार्गदर्शन के साथ खेती की योजना बनानी चाहिए।

फसल अवशेषों को खाद में बदलना क्यों उपयोगी?

फसल अवशेष केवल खेत की सफाई की समस्या नहीं हैं। इनमें ऐसे जैविक पदार्थ और पोषक तत्व मौजूद होते हैं जिन्हें उचित प्रबंधन के जरिए कृषि प्रणाली में वापस लाया जा सकता है।

यदि किसान अवशेषों को जलाने के बजाय कम्पोस्ट बनाते हैं या उपयुक्त तरीके से खेत में उनका प्रबंधन करते हैं, तो मिट्टी के जैविक पदार्थों के संरक्षण में मदद मिल सकती है।

इससे लंबे समय में मिट्टी की संरचना और भूमि की उत्पादन क्षमता बनाए रखने में सहायता मिल सकती है।

हालांकि, फसल अवशेषों का अपघटन पूरा होने, पोषक तत्व उपलब्ध होने और खाद की गुणवत्ता सुनिश्चित करने में समय लगता है। इसलिए किसानों को अगली फसल की बुवाई और पोषण प्रबंधन को ध्यान में रखकर योजना बनानी चाहिए।

नरवाई प्रबंधन: नरवाई नहीं जलाएं, किसान अपना सकते हैं ये 5 तरीके

किसान संगठन गांवों में चलाएंगे जागरूकता अभियान

कलेक्टर प्रियंक मिश्रा ने किसान संगठनों से गांवों में जाकर नरवाई नहीं जलाने के लिए किसानों को जागरूक करने की अपील की है।

बैठक में इस बात पर जोर दिया गया कि कृषि की नई तकनीकों की जानकारी केवल बैठकों तक सीमित नहीं रहनी चाहिए। किसान संगठनों के माध्यम से इसे गांवों और खेतों तक पहुंचाना आवश्यक है।

किसानों को फसल अवशेष जलाने से होने वाले नुकसान समझाने के साथ ऐसे विकल्पों की जानकारी देना भी जरूरी है जिन्हें वे व्यवहार में अपना सकें।

इसके लिए कृषि विभाग से तकनीकी मार्गदर्शन, फसल अवशेष प्रबंधन मशीनों की उपलब्धता और सामूहिक उपयोग की व्यवस्था जैसे पहलू महत्वपूर्ण हो सकते हैं।

नरवाई प्रबंधन: नरवाई नहीं जलाएं, किसान अपना सकते हैं ये 5 तरीके

छोटे किसानों के लिए मशीनों की उपलब्धता भी चुनौती

नरवाई प्रबंधन की कई आधुनिक तकनीकों में कृषि मशीनों का उपयोग होता है। हालांकि, सभी किसानों के लिए ये मशीनें व्यक्तिगत रूप से खरीदना आर्थिक रूप से संभव नहीं होता।

विशेषकर छोटे और सीमांत किसानों के लिए मशीन किराये पर मिलने, स्थानीय स्तर पर कृषि यंत्रों की सुविधा और समय पर तकनीकी सहायता की उपलब्धता महत्वपूर्ण है।

ऐसी स्थिति में किसान संगठन और स्थानीय कृषि संस्थाएं किसानों तक उपयोगी जानकारी पहुंचाने में भूमिका निभा सकती हैं।

किसानों के लिए केवल नरवाई न जलाने की अपील पर्याप्त नहीं होगी। उन्हें यह भी जानना जरूरी है कि उपलब्ध संसाधनों और लागत के अनुसार कौन सा विकल्प अपनाना अधिक उपयोगी रहेगा।

नरवाई प्रबंधन से खेती और पर्यावरण को दोहरा लाभ

फसल अवशेषों का उचित प्रबंधन खेती को अधिक टिकाऊ बनाने की दिशा में महत्वपूर्ण कदम हो सकता है।

जहां इससे खेत में आग लगाने से होने वाला प्रदूषण रोका जा सकता है, वहीं फसल अवशेषों को उपयोगी जैविक संसाधन के रूप में संरक्षित करने का अवसर मिलता है।

भोपाल जिला प्रशासन की पहल का उद्देश्य किसान संगठनों की मदद से किसानों को इन विकल्पों की जानकारी देना है।

किसानों के लिए सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि नरवाई को खेत का बेकार कचरा समझकर जलाने के बजाय उसके वैज्ञानिक और आर्थिक उपयोग पर ध्यान दें। उचित तकनीक और समय पर प्रबंधन अपनाने से मिट्टी की सेहत बनाए रखने तथा अगली फसल की बेहतर तैयारी में मदद मिल सकती है।

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