⌖ भोपाल▤ ई-पेपर
मंडी भाव सोयाबीन 4520 ₹/क्विंटल गेहूं 2425 ₹/क्विंटल चना 5650 ₹/क्विंटल

गुना में 1,000 एकड़ गेंदे की खेती का सपना, पड़ोसी जिले में किसान ने क्यों उजाड़ दिए 10 बीघा फूल?

रिपोर्ट: विवेक शर्मा 'विक्की'संपादन: मृदुल जैनKisan Culture
गेंदे की खेती में उचित भाव नहीं मिलने पर अशोकनगर के भुगावली गांव में किसान संदीप दीक्षित की 10 बीघा फूलों की फसल नष्ट करने की घटना।

गेंदे की खेती से अच्छी कमाई की उम्मीद में एक किसान ने करीब 40 हजार पौधे लगाए, लगभग सवा दो लाख रुपये खर्च किए और महीनों मेहनत करके फसल तैयार की। पौधों पर फूल भी खूब खिले, लेकिन जब उन्हें बेचने की बारी आई तो बाजार में इतना कम भाव मिला कि तुड़ाई और परिवहन का खर्च निकालना मुश्किल हो गया।

आखिरकार किसान ने 10 बीघा में खड़ी फूलों की फसल पर ट्रैक्टर और रोटावेटर चलवा दिया। यह कहानी उस समय सामने आई है जब मध्यप्रदेश में ‘कृषक कल्याण वर्ष 2026’ मनाया जा रहा है और गुना प्रशासन 1,000 एकड़ में गेंदे की खेती को बढ़ावा देने की तैयारी कर रहा है। आखिर फूलों से खुशहाली का सपना देखने वाले किसान को अपनी ही फसल क्यों उजाड़नी पड़ी?

Table of Contents

किसान कल्चर, अशोकनगर/गुना: जिस खेत में कुछ दिन पहले तक गेंदे के फूल खिले थे, वहां अब रोटावेटर चल चुका है। किसान ने जिन पौधों को महीनों मेहनत से तैयार किया, उन्हीं को अपनी आंखों के सामने मिट्टी में मिलवा दिया। फसल तैयार थी, पौधों पर फूल भी आ रहे थे, लेकिन बाजार में कीमत इतनी कम थी कि फूल तुड़वाकर मंडी पहुंचाने में और नुकसान होने का डर था। आखिरकार किसान ने खड़ी फसल उजाड़कर अगली फसल की बुआई करने का फैसला लिया।

यह कहानी है गुना निवासी किसान संदीप दीक्षित की। संदीप ने पड़ोसी अशोकनगर जिले की नई सराय तहसील के भुगावली गांव में 10 बीघा जमीन पर गेंदे की खेती की थी। करीब 40 हजार पौधे लगाए और फूल आने तक लगभग ₹2 लाख से ₹2.25 लाख खर्च किए। लेकिन पूरे सीजन में लाभकारी भाव नहीं मिलने से उन्हें खड़ी फसल पर ट्रैक्टर चलवाना पड़ा। अब उसी खेत में उन्होंने सरसों की बुआई कर दी है।

संदीप ने किसान कल्चर से बातचीत में कहा, “₹10 किलो तो तुड़ाई लगती है और ₹5 किलो ट्रांसपोर्टेशन में चला जाता है। ₹20 किलो भाव भी मिल जाए तो कौन सा ज्यादा मिला? इस बार पूरे सीजन भाव नहीं मिला। इसलिए मैंने रोटावेटर चलाकर सरसों बो दी।”

दूसरों की खबरें लिखने वाला पत्रकार, आज खुद बना खेती के नुकसान की खबर

संदीप दीक्षित की पहचान केवल किसान की नहीं है। कृषि उनका मुख्य पेशा है, लेकिन वे पत्रकारिता से भी जुड़े हुए हैं। गुना जिले में वे न्यूज18 (News18) और समाचार एजेंसी प्रेस ट्रस्ट ऑफ इंडिया (PTI) के लिए स्ट्रिंगर के तौर पर काम करते हैं।

दूसरों की समस्याओं और घटनाओं को खबरों के माध्यम से सामने लाने वाले संदीप इस बार खुद खेती में नुकसान की कहानी सुना रहे हैं।

हालांकि पत्रकारिता से जुड़े होने के बावजूद उनकी मुख्य आजीविका और पेशेवर पहचान कृषि ही है। वे वर्षों से खेती कर रहे हैं और पारंपरिक फसलों के अलावा फूलों की व्यावसायिक खेती भी करते रहे हैं।

पिछले साल उन्होंने लगभग 35 बीघा में गेंदा लगाया था। फूलों की बिक्री के लिए स्थानीय मंडियों के अलावा दूसरे राज्यों के बाजारों से भी उनका संपर्क रहा है।

लेकिन खेती का अनुभव, पत्रकारिता से जुड़ी जानकारी और अलग-अलग मंडियों तक पहुंच भी इस बार उन्हें बाजार के संकट से नहीं बचा सकी।

गेंदे की खेती में 40 हजार पौधे, लाखों का निवेश और महीनों की मेहनत

संदीप बताते हैं कि उन्होंने इस सीजन में गेंदे की खेती करने 10 बीघा में गेंदे के पौधे लगाए थे। एक बीघा में लगभग चार हजार पौधे लगाए जाते हैं। इस हिसाब से पूरे खेत में करीब 40 हजार पौधे तैयार किए गए।

उनके मुताबिक बीज का एक पैकेट लगभग ₹1,800 का आता है, जिसमें करीब 1,020 बीज होते हैं। एक बीघा में लगभग चार पैकेट की आवश्यकता होती है। यानी केवल बीज का खर्च लगभग ₹7,200 प्रति बीघा बैठता है।

बीज के बाद पौधे तैयार करने के लिए कोकोपीट और नर्सरी ट्रे की आवश्यकता होती है। संदीप के अनुसार इन दोनों पर लगभग ₹3,600 प्रति बीघा खर्च आता है।

इसके बाद खेत की तैयारी, बेसल डोज, बेड बनाने, ड्रिप सिंचाई, मल्चिंग, पौध रोपाई और मजदूरी पर राशि खर्च होती है।

संदीप का अनुमान है कि पूरी फसल को फूल आने की अवस्था तक पहुंचाने में लगभग ₹2 लाख से ₹2.25 लाख का निवेश हो चुका था।

यह खर्च किसान द्वारा बातचीत में बताया गया अनुमान है। खर्च की सभी मदों का अंतिम सत्यापित हिसाब उपलब्ध नहीं है।

गेंदे की खेती : ₹20 किलो फूल का भाव, ₹15 तुड़ाई और भाड़ा! आखिर किसान के हाथ क्या बचता?

संदीप बताते हैं कि गेंदे की खेती में सबसे बड़ी चुनौती फूल तैयार होने के बाद शुरू होती है।

फूलों की समय पर तुड़ाई करनी पड़ती है। उन्हें अधिक समय तक खेत में या खुले में सुरक्षित नहीं रखा जा सकता। तुड़ाई के बाद जल्द बाजार तक पहुंचाना भी जरूरी होता है।

उनके अनुसार फूल तुड़वाने पर लगभग ₹10 प्रति किलो मजदूरी लगती है, जबकि बाहर की मंडियों तक भेजने में लगभग ₹5 प्रति किलो परिवहन खर्च होता है।

यानी फूलों को खेत से बाजार तक पहुंचाने में ही करीब ₹15 प्रति किलो खर्च हो जाते हैं।

संदीप का कहना है कि इस सीजन में उनके संपर्क वाले बाजारों में गेंदे की कीमत ₹20 प्रति किलो से ऊपर नहीं जा सकी।

ऐसी स्थिति में ₹20 प्रति किलो भाव मिलने पर भी तुड़ाई और परिवहन निकालने के बाद केवल ₹5 प्रति किलो बचते हैं। इसी रकम से बीज, खाद, पौध तैयार करने, सिंचाई और अन्य खर्च निकालने होते हैं।

संदीप के सामने सवाल था कि जब फूल बेचने से अतिरिक्त आमदनी के बजाय और खर्च होने का खतरा है, तो क्या फसल को इसी तरह खेत में खड़ा रखा जाए?

देखिए वीडियो: उचित भाव नहीं मिलने पर किसान ने 10 बीघा में खड़ी गेंदे की फसल पर कैसे चलवाया ट्रैक्टर।

गुना, इंदौर, उज्जैन, जयपुर से कानपुर तक बाजार तलाशा, फिर भी नहीं बनी बात

संदीप को फूलों की खेती और बिक्री का पुराना अनुभव है। पिछले साल वे करीब 35 बीघा में गेंदा लगा चुके थे।

उनके अनुसार वे गुना के स्थानीय बाजार के अलावा इंदौर, उज्जैन और जयपुर में भी फूल बेचते रहे हैं। इस बार उन्होंने भोपाल और कानपुर सहित दूसरे बाजारों में बिक्री की संभावनाएं तलाशीं।

लेकिन उनके मुताबिक पूरे सीजन में ऐसी कीमत नहीं मिल सकी, जिसमें फसल की लागत निकलने की उम्मीद बनती।

उन्होंने बताया कि यदि फूल तुड़वाकर फेंके जाते तो मजदूरी का खर्च होता। यदि दूसरे शहर भेजते तो परिवहन खर्च जुड़ जाता। वहीं, बेहतर भाव के इंतजार में खेत खाली नहीं करते तो अगली फसल की बुआई में देरी होती।

आखिरकार उन्होंने गेंदे के पौधे रोटावेटर से नष्ट करवाकर सरसों बोने का फैसला लिया।

इस फैसले से ट्रैक्टर और डीजल का अतिरिक्त खर्च भी हुआ, लेकिन संदीप के अनुसार अगली फसल की तैयारी के लिए यही व्यावहारिक रास्ता बचा था।

कृषक कल्याण वर्ष 2026 में भी किसान को अपनी फसल क्यों उजाड़नी पड़ी?

गेंदे की खेती में नुकसान झेलने वाले किसान संदीप दीक्षित का फोटो-कोट, जिसमें ₹20 किलो फूल का भाव, ₹15 तुड़ाई और परिवहन खर्च तथा 10 बीघा फसल उजाड़ने की मजबूरी बताई गई है।
“₹20 किलो फूल बिकें और तुड़ाई-भाड़ा ही ₹15 पड़ जाए, तो किसान कमाए क्या?” अशोकनगर में 10 बीघा गेंदे की फसल नष्ट करने वाले किसान संदीप दीक्षित ने बताई अपनी परेशानी। फोटो-कोट: किसान कल्चर।

मध्यप्रदेश सरकार ने वर्ष 2026 को ‘कृषक कल्याण वर्ष’ घोषित किया है। मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने ‘समृद्ध किसान, समृद्ध प्रदेश’ के संकल्प के साथ किसानों की आय बढ़ाने, उत्पादन लागत कम करने और कृषि उत्पादों को बेहतर बाजार उपलब्ध कराने पर जोर दिया है।

इसके लिए कृषि और उससे जुड़े 16 विभागों के समन्वय से गतिविधियां संचालित करने की योजना है। इनमें उद्यानिकी, कृषि विविधीकरण, फूड प्रोसेसिंग और विपणन व्यवस्था को मजबूत करने जैसे पहलू भी शामिल हैं।

लेकिन इसी कृषक कल्याण वर्ष में संदीप दीक्षित को तैयार फूलों की फसल उजाड़नी पड़ी।

संदीप ने पारंपरिक खेती के अलावा व्यावसायिक फूलों की खेती अपनाई। आधुनिक तरीके से पौधे तैयार किए। ड्रिप सिंचाई और मल्चिंग पर निवेश किया। फसल तैयार होने के बाद दूसरे शहरों तक बाजार तलाशा।

इसके बावजूद उन्हें लाभकारी कीमत नहीं मिली।

यह घटना पूरे कृषक कल्याण वर्ष की सफलता या विफलता का प्रमाण नहीं है, लेकिन किसानों की आय बढ़ाने की नीतियों के सामने एक महत्वपूर्ण सवाल जरूर रखती है।

जब किसान नई फसल अपनाकर अच्छा उत्पादन कर लेता है, लेकिन बाजार में उसकी लागत भी नहीं निकलती, तो कृषि विविधीकरण से आय बढ़ाने का लक्ष्य कैसे हासिल होगा?

गुना में 1,000 एकड़ गेंदे की खेती का सपना, पड़ोसी जिले में सामने आया बाजार का संकट

इस कहानी का सबसे महत्वपूर्ण पहलू संदीप के गृह जिले गुना से जुड़ा है।

गुना कलेक्टर किशोर कुमार कन्याल जिले में फूलों की खेती को बढ़ावा देने के लिए प्रयास कर रहे हैं।

प्रशासन की पहल पर जिले में 2,085 एकड़ क्षेत्र में फूलों और धनिया के चार क्लस्टर विकसित करने की योजना को स्वीकृति मिली है।

इनमें अकेले गेंदे की खेती के लिए 1,000 एकड़ का क्लस्टर शामिल है। गुना विकासखंड में 630 एकड़ और बमोरी में 370 एकड़ क्षेत्र निर्धारित किया गया है।

इसके अलावा 40 एकड़ में गुलाब, 45 एकड़ में अन्य पुष्प फसलें और 1,000 एकड़ में धनिया बीज उत्पादन का क्लस्टर प्रस्तावित है।

योजना के तहत किसानों को तकनीकी प्रशिक्षण, बेहतर रोपण सामग्री, भंडारण, ग्रेडिंग, प्रसंस्करण, मूल्य संवर्धन और विपणन सुविधाओं से जोड़ने पर जोर दिया गया है।

कलेक्टर कन्याल की पहल का उद्देश्य किसानों को परंपरागत खेती से आगे बढ़कर उद्यानिकी की ऐसी फसलें अपनाने के लिए प्रोत्साहित करना है, जिनसे उनकी आय में वृद्धि की संभावना हो।

लेकिन संदीप का अनुभव इस योजना के बाजार संबंधी पहलू को महत्वपूर्ण बना देता है।

सवाल उठता है कि जब पहले से फूल उगा रहे किसान को लाभकारी कीमत नहीं मिल रही, तो उत्पादन बढ़ने के बाद अतिरिक्त फूलों की बिक्री किस तरह सुनिश्चित होगी?

क्या किसानों को सीधे बड़े खरीदारों से जोड़ा जाएगा? क्या फूलों के सामूहिक परिवहन की व्यवस्था होगी? और क्या कम कीमत मिलने पर प्रसंस्करण या मूल्य संवर्धन के विकल्प उपलब्ध होंगे?

एक किसान के फूलों से लाखों की कमाई, दूसरे की खड़ी फसल उजड़ गई

गुना में फूलों की खेती से सफल आय के उदाहरण भी सामने आए हैं।

जामनेर गांव के किसान गोपाल सैनी की फूलों की खेती से सालाना करीब ₹5 से ₹6 लाख मुनाफा होने की जानकारी अगस्त 2026 में सामने आई थी। कलेक्टर किशोर कुमार कन्याल ने उनके खेत का निरीक्षण भी किया था।

ऐसी सफलता की कहानियां दूसरे किसानों को फूलों की खेती अपनाने के लिए प्रेरित करती हैं।

लेकिन दूसरी ओर संदीप दीक्षित का अनुभव यह बताता है कि फूलों की खेती में अच्छी पैदावार के बावजूद बाजार संबंधी जोखिम बना रहता है।

दोनों किसानों की खेती, फसल, लागत और बिक्री की परिस्थितियां अलग हो सकती हैं। इसलिए उनकी आमदनी की सीधी तुलना करना उचित नहीं होगा।

फिर भी दोनों उदाहरण मिलकर यह सवाल उठाते हैं कि सफल किसानों के मॉडल को दूसरे किसानों तक पहुंचाने के साथ उन्हें बाजार के जोखिम से बचाने के लिए कैसी व्यवस्था होनी चाहिए।

कृषि विभाग पर संदीप का आरोप, मदद मांगने पर अपेक्षित सहयोग नहीं मिला

संदीप दीक्षित ने फूलों की खेती शुरू करने के दौरान सरकारी सहायता और मार्गदर्शन लेने के अपने अनुभव को लेकर भी नाराजगी जताई।

उन्होंने आरोप लगाया कि जब दो साल पहले जब उन्होंने फूलों की खेती शुरू करने की योजना बनाई थी, तब वह उद्यानिक विभाग के अधिकारियों के पास मार्गदर्शन एवं सहयोग लेने गए थे, लेकिन उन्हें अपेक्षित मदद नहीं मिली।

संदीप के अनुसार अधिकारियों के व्यवहार से परेशान होकर उन्होंने अपने संसाधनों और प्रयासों से खेती शुरू की।

उनका आरोप है कि जब किसान सफल हो जाता है तो विभाग के अधिकारी उसकी सफलता का श्रेय लेने पहुंच जाते हैं, लेकिन कठिन समय में अपेक्षित सहयोग नहीं मिल पाता।

संदीप के इन आरोपों को लेकर जब किसान कल्चर ने उद्यानिकी विभाग, अशोकनगर के प्रभारी सहायक संचालक गबरू ग्रेवाल से बात की, तो उनका कहना था कि यह घटनाक्रम मेरी जानकारी में नहीं था, आपके द्वारा ही मेरे स्ंझान में मामला आया था, मैं इस मामले की जांच कर संबंधित किसान से बात करता हूं।

गेंदा उगाना आसान नहीं, लेकिन असली चुनौती उसे लाभकारी कीमत पर बेचना

गेंदे की खेती को कई क्षेत्रों में किसानों के लिए आय बढ़ाने का विकल्प माना जाता है। त्योहारों, विवाह समारोहों, मंदिरों और सजावट के कारोबार में फूलों की मांग रहती है।

लेकिन फूल जल्दी खराब होने वाला उत्पाद है। तैयार उपज को लंबे समय तक सुरक्षित रखने की सुविधा सीमित होने से किसानों को जल्द बिक्री करनी पड़ती है।

मांग कम होने या मंडियों में अधिक आवक के समय कीमतें कमजोर पड़ सकती हैं।

इसलिए फूलों की खेती का रकबा बढ़ाने से पहले बाजार, परिवहन, भंडारण और संभावित खरीदारों की व्यवस्था पर ध्यान देना महत्वपूर्ण है।

किसान उत्पादक समूहों के माध्यम से सामूहिक परिवहन, सीधे खरीदारों से संपर्क और फूलों से मूल्यवर्धित उत्पाद तैयार करने जैसे विकल्प तलाशे जा सकते हैं।

हालांकि इन विकल्पों की वास्तविक लाभप्रदता स्थानीय परिस्थितियों, निवेश और बाजार की मांग पर निर्भर करेगी।

फूलों की जगह अब सरसों, लेकिन किसान का सवाल बाकी

संदीप दीक्षित के खेत में अब गेंदे के फूल नहीं हैं।

जिस जमीन पर लगभग 40 हजार पौधे लगाए गए थे, वहां रोटावेटर चल चुका है। अब उन्होंने उसी खेत में सरसों की बुआई कर दी है।

करीब दो से सवा दो लाख रुपये का शुरुआती निवेश करने वाले संदीप को इस सीजन में फूलों की खेती से अपेक्षित आमदनी नहीं हो सकी। हालांकि कितने फूल बिके और उनसे कुल कितनी राशि प्राप्त हुई, इसका अंतिम विवरण उपलब्ध नहीं है। इसलिए पूरी निवेश राशि को शुद्ध नुकसान नहीं कहा जा सकता।

संदीप की कहानी इसलिए भी अलग है कि वे दूसरों की समस्याओं को पत्रकारिता के माध्यम से सामने लाते रहे हैं। लेकिन इस बार अपनी खेती के संकट ने उन्हें खुद एक ऐसी खबर का हिस्सा बना दिया, जो फूलों की व्यावसायिक खेती की जमीनी चुनौतियां उजागर करती है।

मध्यप्रदेश में कृषक कल्याण वर्ष चल रहा है। गुना में एक हजार एकड़ गेंदे की खेती को प्रोत्साहित करने की तैयारी है। किसानों को नई फसलें अपनाकर आय बढ़ाने के लिए प्रेरित किया जा रहा है।

इन उम्मीदों के बीच संदीप के खेत में उजड़े गेंदे के पौधे एक जरूरी सवाल छोड़ गए हैं।

किसान फूल उगा सकता है, अच्छी फसल तैयार कर सकता है और उसे दूर की मंडियों तक पहुंचाने की कोशिश भी कर सकता है। लेकिन यदि उसकी मेहनत की कीमत ही न मिले, तो फूलों से खुशहाली का सपना आखिर कैसे पूरा होगा?

यह भी पढ़े…गुना की नई पहचान बनेंगे खुले खेतों के फूल, 2,085 एकड़ में विकसित होंगे चार क्लस्टर