ड्रिप पाइप रीसाइक्लिंग से कारोबार: ₹1.28 करोड़ के निवेश पर भावना को ₹61.44 लाख की सरकारी मदद

ड्रिप पाइप रीसाइक्लिंग को बड़वानी की भावना पटेल ने खेत के प्लास्टिक कचरे से कारोबार बनाने का जरिया बना दिया। खेतों में इस्तेमाल के बाद बेकार हो चुकी पुरानी ड्रिप पाइप उनकी यूनिट में पहुंचती हैं, जहां मशीनों से उन्हें प्लास्टिक के दानों में बदला जाता है। ये दाने महाराष्ट्र के रीसाइक्लिंग प्लांट भेजे जाते हैं और वहां इनसे फिर नई ड्रिप पाइप तैयार होती है। भावना की यूनिट में ₹1.28 करोड़ के निवेश पर ₹61.44 लाख की सरकारी मदद मंजूर हुई है।
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किसान कल्चर, बड़वानी: किसान के खेत में सालों तक सिंचाई करने वाली ड्रिप पाइप खराब होने के बाद अक्सर प्लास्टिक कचरा बन जाती है। बड़वानी जिले की भावना पटेल ने इसी बेकार समझी जाने वाली पाइप में कारोबार का मौका तलाश लिया। राजपुर तहसील के ग्राम नरावला की भावना ने मेसर्स पटेल एग्रो इंडस्ट्रीज शुरू की, जहां खेतों से निकलने वाली पुरानी ड्रिप पाइप को प्रोसेस कर दोबारा इस्तेमाल लायक प्लास्टिक में बदला जा रहा है।
कृषक परिवार से आने वाली भावना ने खेती से दूरी बनाकर उद्योग नहीं चुना, बल्कि खेती से जुड़ी एक समस्या को ही अपने कारोबार का आधार बनाया। उनकी यूनिट में पुरानी ड्रिप पाइप से प्लास्टिक के छोटे दाने तैयार होते हैं। ये दाने महाराष्ट्र के प्लांट तक पहुंचते हैं और वहां फिर नई ड्रिप पाइप का रूप लेते हैं।
ड्रिप पाइप रीसाइक्लिंग से कचरा बना कच्चा माल
ड्रिप पाइप रीसाइक्लिंग की इस पूरी प्रक्रिया की शुरुआत खेत से होती है। इस्तेमाल के बाद खराब हो चुकी ड्रिप पाइप को इकट्ठा किया जाता है। यूनिट में मशीनों की मदद से पाइप को प्रोसेस कर छोटे प्लास्टिक दानों में बदला जाता है।
इन दानों को नई ड्रिप बनाने के लिए महाराष्ट्र के रीसाइक्लिंग प्लांट भेजा जाता है। वहां आगे की प्रोसेसिंग के बाद इन्हीं से नई ड्रिप पाइप तैयार की जाती है।
यानी पूरी चेन इस तरह चलती है:
पुरानी ड्रिप पाइप → रीसाइक्लिंग यूनिट → प्लास्टिक के दाने → नई ड्रिप पाइप → फिर किसान का खेत
इस मॉडल की खास बात यही है कि खेत से निकला प्लास्टिक बेकार होने के बजाय एक बार फिर खेती की सप्लाई चेन में लौट आता है।
₹1.28 करोड़ के निवेश पर ₹61.44 लाख की सरकारी मदद
भावना पटेल की यूनिट को आगे बढ़ाने के लिए मध्य प्रदेश MSME प्रोत्साहन योजना के तहत आर्थिक मदद भी मंजूर हुई है।
₹1.28 करोड़ के निवेश पर महिला उद्यमी के रूप में ₹61.44 लाख की सरकारी मदद स्वीकृत की गई है। यह रकम चार बराबर सालाना किस्तों में दी जाएगी।
भावना का कारोबार इस लिहाज से भी खास है कि सरकारी मदद किसी पारंपरिक कारोबार के बजाय खेती से निकलने वाले प्लास्टिक की रीसाइक्लिंग से जुड़े उद्योग को मिली है।
यह मॉडल गांव और छोटे शहरों में ऐसे कारोबार की संभावनाओं की तरफ भी इशारा करता है, जहां आसपास उपलब्ध कृषि कचरा ही उद्योग का कच्चा माल बन सकता है।
पुरानी ड्रिप किसान के लिए कचरा, यूनिट के लिए Raw Material
ड्रिप सिंचाई का इस्तेमाल बढ़ने के साथ खेतों में प्लास्टिक पाइप की मात्रा भी बढ़ी है। एक तय समय के बाद पाइप खराब हो जाती है और किसान के लिए उसका सीधा इस्तेमाल खत्म हो जाता है।
यहीं से ड्रिप पाइप रीसाइक्लिंग का कारोबार शुरू होता है।
जो चीज किसान के लिए बेकार है, वही किसी प्रोसेसिंग यूनिट के लिए raw material बन सकती है। अगर पुराने प्लास्टिक के कलेक्शन, प्रोसेसिंग और आगे खरीदार की मजबूत व्यवस्था बन जाए तो गांव के आसपास भी ऐसा कारोबार खड़ा किया जा सकता है।
भावना की यूनिट इसी chain का पहला अहम हिस्सा संभाल रही है।
खेत से फैक्ट्री और फिर खेत तक
इस कारोबार की सबसे दिलचस्प बात इसकी पूरी journey है। एक बार खेत में इस्तेमाल हुई ड्रिप पाइप खराब होने के बाद यूनिट तक पहुंचती है। वहां उससे प्लास्टिक के दाने बनते हैं। ये दाने दूसरे प्लांट में जाकर फिर पाइप का रूप लेते हैं और नई ड्रिप के तौर पर किसी खेत में इस्तेमाल हो सकते हैं।
यानी प्लास्टिक का सफर खत्म नहीं होता, उसका रूप बदल जाता है।
यह उसी सोच का उदाहरण है जिसे कारोबार की भाषा में Circular Economy कहा जाता है। आसान भाषा में इसका मतलब है कि किसी चीज को इस्तेमाल के बाद फेंकने के बजाय उससे दोबारा काम का सामान बनाया जाए।

ड्रिप पाइप रीसाइक्लिंग से पर्यावरण को भी फायदा
खेतों से निकलने वाले प्लास्टिक का सही निपटान न हो तो वह लंबे समय तक वहीं पड़ा रह सकता है। ऐसे प्लास्टिक को जलाना भी सही विकल्प नहीं है।
रीसाइक्लिंग के जरिए पुराने प्लास्टिक को दोबारा इस्तेमाल में लाने का रास्ता मिलता है। इससे नए प्लास्टिक की जरूरत पूरी तरह खत्म नहीं होती, लेकिन पहले इस्तेमाल हो चुके प्लास्टिक को दोबारा काम में लेने की संभावना बढ़ती है।
भावना के कारोबार में यही चीज नजर आती है। यहां कृषि प्लास्टिक को सीधे कचरा मानने के बजाय अगली manufacturing process के लिए सामग्री में बदला जा रहा है।
गांव में भी खड़ा हो सकता है एग्री-बिजनेस
भावना पटेल की कहानी केवल एक महिला उद्यमी की सफलता तक सीमित नहीं है। इसमें किसानों और ग्रामीण युवाओं के लिए भी एक कारोबार का आइडिया छिपा है।
एग्री-बिजनेस सिर्फ खाद, बीज, ट्रैक्टर, मंडी या फसल खरीद-बिक्री तक सीमित नहीं है। खेती में इस्तेमाल होने वाली चीजों की repair, collection, processing और recycling भी इससे जुड़ा कारोबार बन सकती है।
किस इलाके में कौन-सा कचरा बड़ी मात्रा में निकल रहा है और उसे खरीदने वाला बाजार कहां है, अगर इसका सही हिसाब लगाया जाए तो स्थानीय स्तर पर छोटे उद्योग की संभावना बन सकती है।
पुरानी ड्रिप पाइप इसका एक उदाहरण है।
महिला उद्यमी ने खेती की समस्या में खोजा कारोबार
कृषक परिवार से आने वाली भावना पटेल का उद्योग यह दिखाता है कि गांव की महिलाएं भी processing और recycling जैसे तकनीकी कारोबार में उतर सकती हैं।
उन्होंने खेती से जुड़ी समस्या को देखा, उसके आसपास बाजार तलाशा और उसे एक business model में बदला।
सरकारी मदद मिलने से यूनिट को आर्थिक सहारा मिला, लेकिन कारोबार की बुनियाद पुरानी ड्रिप की उपलब्धता और उससे तैयार प्लास्टिक दानों के खरीदार पर टिकी है।
यही किसी भी recycling business की सबसे जरूरी कड़ी भी होती है।
ड्रिप पाइप रीसाइक्लिंग से खुल सकती हैं नई संभावनाएं
ड्रिप पाइप रीसाइक्लिंग का यह मॉडल किसानों के लिए सीधे कोई नई योजना नहीं है, लेकिन यह जरूर दिखाता है कि खेती से निकलने वाली चीजों के आसपास भी कारोबार खड़ा किया जा सकता है।
भावना ने खेत की बेकार ड्रिप को अपनी यूनिट का कच्चा माल बनाया। मशीनों से प्लास्टिक दाने तैयार किए और उन्हें ऐसे प्लांट से जोड़ा जहां उसी सामग्री से फिर नया उत्पाद बनता है।
खेत से फैक्ट्री और फिर खेत तक लौटती पुरानी ड्रिप की यह कहानी बड़वानी के एक गांव से निकली है, लेकिन इसका आइडिया बड़ा है। सही तकनीक, खरीदार और निवेश मिले तो कृषि कचरा भी ग्रामीण उद्योग और रोजगार की नई राह खोल सकता है।
