नरवाई (पराली) की आग: MP में 94, पंजाब में 84 घटनाएं, लेकिन क्या वाकई मध्यप्रदेश आगे?

पराली की आग अब सिर्फ पंजाब-हरियाणा की कहानी नहीं रही। धान कटाई के मौजूदा सीजन में मध्यप्रदेश में नरवाई (पराली) जलाने के 94 satellite fire events दर्ज हुए हैं, जबकि पंजाब में 84 और उत्तर प्रदेश में 63 घटनाएं सामने आई हैं। लेकिन क्या 94 बनाम 84 का मतलब यह है कि मध्यप्रदेश में पंजाब से ज्यादा पराली जलाई गई? विशेषज्ञ और किसान संगठन इस सीधी तुलना पर सवाल उठा रहे हैं। बड़ा सवाल यह भी है कि मशीन, डीकम्पोजर और सब्सिडी की योजनाओं के बावजूद किसान को खेत में आग लगाने से रोकने वाला सस्ता और समय पर उपलब्ध विकल्प आखिर कहां है?
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किसान कल्चर, भोपाल: मध्यप्रदेश में नरवाई (पराली) जलाने की 94 और पंजाब में 84 satellite fire events दर्ज होने के बाद यह दावा चर्चा में है कि पराली जलाने में MP पंजाब से आगे निकल गया है। लेकिन आंकड़ों की तह में जाएं तो तस्वीर इतनी सीधी नहीं है। ICAR-IARI का satellite system आग की घटनाएं दर्ज करता है, इससे यह नहीं पता चलता कि किस राज्य में कितने हेक्टेयर खेत या कितनी मात्रा में नरवाई जली। दूसरी तरफ किसान संगठनों का सवाल है कि यदि किसान नरवाई न जलाए तो समय पर अगली बोनी के लिए उसके पास सस्ता विकल्प क्या है? कृषि और सामाजिक क्षेत्र के विशेषज्ञ भी मानते हैं कि केवल रोक और जुर्माना लगाने के बजाय मशीन, डीकम्पोजर, प्रशिक्षण और आर्थिक प्रोत्साहन खेत तक पहुंचाना होगा।
नरवाई (पराली) के 94 बनाम 84 मामले आखिर हैं क्या?
Times of India में 6 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित रिपोर्ट में ICAR-IARI के CREAMS data के हवाले से बताया गया कि सोमवार को मध्यप्रदेश में 24 नई फसल अवशेष जलाने की घटनाएं दर्ज हुईं। इसके बाद मौजूदा सीजन में MP का आंकड़ा 94 हो गया, जबकि पंजाब में 84, उत्तर प्रदेश में 63, राजस्थान में सात, हरियाणा में चार तथा दिल्ली और उत्तराखंड में एक-एक घटना दर्ज की गई। सात राज्यों में कुल 254 घटनाएं रिपोर्ट हुईं।
इससे एक दिन पहले तक तस्वीर अलग थी। ICAR-Indian Agricultural Research Institute के CREAMS Lab की 4 अक्टूबर की आधिकारिक bulletin के मुताबिक 15 सितंबर से 4 अक्टूबर के बीच पंजाब में 79 और मध्यप्रदेश में 70 धान के अवशेष (पराली) जलाने की घटना दर्ज हुईं थीं। 4 अक्टूबर को पंजाब में छह और MP में चार घटनाएं मिली थीं।
यहीं आंकड़े को समझने की जरूरत है। CREAMS इसे “धान की पराली जलाने के कारण खेतों में आग लगने की घटनाओं” के रूप में दर्ज करता है। यानी सेटेलाइट किसी स्थान पर फसल अवशेष जलने की घटना डिटेक्ट करता है। केवल 94 और 84 की संख्या से अपने आप यह साबित नहीं होता कि मध्यप्रदेश में पंजाब से ज्यादा हेक्टेयर खेत या ज्यादा टन नरवाई जलाई गई। यह इन आंकड़ों से निकाला गया एक अलग निष्कर्ष होगा, जिसके लिए जले हुए क्षेत्र और फसल अवशेष (नरवाई/ पराली) की मात्रा का डाटा भी जरूरी होगा।
किसान संगठन ने मध्यप्रदेश-पंजाब की सीधी तुलना पर उठाए सवाल
भारतीय किसान संघ के मध्यभारत प्रांत के प्रांत महामंत्री शिवनंदन सिंह रघुवंशी ने किसान कल्चर से बातचीत में मध्यप्रदेश और पंजाब की केवल आग लगने की घटनाओं की संख्या के आधार पर तुलना को भ्रामक बताया।
उनका कहना है कि दोनों राज्यों के crop pattern, harvesting system और नरवाई (पराली) की प्रकृति अलग-अलग है। इसलिए केवल सेटेलाइट पर दिखी आग की घटनाओं की संख्या के आधार पर यह कहना कि मध्यप्रदेश में पंजाब से ज्यादा नरवाई जलाई जा रही है, पूरी तस्वीर नहीं दिखाता।
हालांकि रघुवंशी की इस दलील का एक हिस्सा कि मध्यप्रदेश में धान और गेहूं का रकबा पंजाब से काफी कम है, केंद्र सरकार के ताजा कृषि आंकड़ों से मेल नहीं खाता।
Agricultural Statistics at a Glance 2024-25 के अनुसार मध्यप्रदेश में धान का रकबा करीब 38.9 लाख हेक्टेयर था, जबकि पंजाब में करीब 32.4 लाख हेक्टेयर। उत्पादन में पंजाब आगे था। पंजाब ने 14.36 मिलियन टन और MP ने 9.11 मिलियन टन चावल का उत्पादन किया।
गेहूं में तो मध्यप्रदेश का रकबा और कुल उत्पादन दोनों पंजाब से अधिक रहे। 2024-25 में MP में करीब 77.5 लाख हेक्टेयर में गेहूं था और उत्पादन 24.51 मिलियन टन रहा। पंजाब का क्षेत्र करीब 35.1 लाख हेक्टेयर और उत्पादन 17.99 मिलियन टन था।
इसलिए असली बहस यह नहीं कि MP में फसल होती है या नहीं, बल्कि यह है कि satellite fire events (सैटेलाइट फायर इवेंट्स) को जली हुई नरवाई की कुल मात्रा मान लेना कितना सही है।
किसान का सवाल, नरवाई नहीं जलाएं तो अगली बोनी कैसे करें?
रघुवंशी का दूसरा सवाल सीधे किसान की लागत और अगली फसल की बोनी से जुड़ा है।
“सरकार एक जिले में चार मशीनें दे दे, अब आप ही बताइए क्या चार मशीनों से पूरे जिले के किसान बोनी कर सकते हैं? नहीं कर सकते,” रघुवंशी ने कहा।
उनके मुताबिक नरवाई (पराली) प्रबंधन की कई मशीनें निजी तौर पर खरीदने पर ढाई से तीन लाख रुपये या उससे ज्यादा पड़ सकती हैं। हर छोटे किसान के लिए ऐसी मशीन खरीदना संभव नहीं है।
रघुवंशी का सुझाव है कि सरकार गांव स्तर पर मशीन उपलब्ध कराने की व्यवस्था बनाए और मशीन खरीदने वाले किसानों को पर्याप्त सब्सिडी दे। यदि गांव में एक-दो किसानों के पास नरवाई प्रबंधन मशीन हो तो वे अपने खेत का काम करने के बाद दूसरे किसानों को किराये पर दे सकते हैं। मशीन खरीदने वाले किसान को आमदनी होगी और बाकी किसानों को स्थानीय स्तर पर सेवा मिलेगी।
ICAR की फसल अपशिष्ट प्रबंधन से जुड़ी सामग्री भी किसान की इस व्यावहारिक समस्या की पुष्टि करती है। ICAR के अनुसार मशीनों द्वारा कटाई, पिछली फसल की कटाई और अगली बुआई के बीच कम समय तथा खेत से नरवाई (पराली) हटाने के लिए मजदूरों की कमी
फसल अवशेष जलाना के प्रमुख कारणों में शामिल हैं।

‘खेत खाली नहीं होगा तो ट्रैक्टर कैसे चलेगा?’
रघुवंशी कहते हैं कि गेहूं की फसल कटने के बाद मध्यप्रदेश में किसान को सोयाबीन, मक्का और दूसरी खरीफ फसलों की तैयारी करनी होती है। खेत में नरवाई खड़ी या फैली रह जाए और उसे हटाने या काटने की मशीन समय पर न मिले तो अगली जुताई प्रभावित होती है।
उनका कहना है कि किसान आग इसलिए नहीं लगाता कि उसे खेत जलाना पसंद है। कई मामलों में उसके सामने समय और लागत का गणित होता है। नरवाई हटाने के लिए मशीन, मजदूर और अतिरिक्त पैसा खर्च करना पड़े, जबकि आग लगाने से खेत जल्दी साफ दिखाई दे तो आर्थिक दबाव में किसान आसान रास्ता चुनता है।
यही कारण है कि नरवाई जलाने की समस्या को केवल किसान की लापरवाही के रूप में देखना अधूरा होगा।
राख से फायदा? किसान के अनुभव और विज्ञान में अंतर
रघुवंशी कृषि वैज्ञानिकों की इस धारणा के कुछ हिस्सों पर सवाल भी उठाते हैं। उनका कहना है कि किसानों ने ऐसे खेत भी देखे हैं जहां कचरा जलाने के बाद फसल अच्छी हुई। उन्होंने अपने खेत का उदाहरण देते हुए बताया कि यूकेलिप्टस हटाने के बाद मेड़ पर बची पत्तियां और अवशेष उन्होंने जलाए थे और इस खरीफ में उसी हिस्से में मक्का बेहतर दिखाई दिया।
उनका यह भी कहना है कि जलने के बाद बनने वाली राख में कुछ पौध पोषक तत्व मौजूद रहते हैं।
किसान के इस अनुभव को दर्ज करना जरूरी है, लेकिन इसे नरवाई जलाने के वैज्ञानिक लाभ के रूप में नहीं देखा जा सकता। ICAR की उपलब्ध रिसर्च का निष्कर्ष है कि जलने से मिट्टी के पोषक तत्व और कार्बनिक पदार्थ का नुकसान होता है तथा लाभकारी सूक्ष्मजीव प्रभावित होते हैं। यानी किसी हिस्से में एक सीजन की अच्छी फसल लंबे समय की मिट्टी गुणवत्ता का प्रमाण नहीं है।
नरवाई जलाने से मिट्टी भी चुकाती है कीमत : डॉ. सुरेश मोटवानी
अंतरराष्ट्रीय संस्था Solidaridad Network से जुड़े कृषि विशेषज्ञ डॉ. सुरेश मोटवानी ने किसान कल्चर से बातचीत में नरवाई (पराली) जलाने को केवल धुएं और वायु प्रदूषण का मामला नहीं मानने की बात कही।
उनके मुताबिक खेत में मौजूद फसल अवशेष जैविक पदार्थ का महत्वपूर्ण स्रोत है। उसे आग के हवाले करने के बजाय मिट्टी में मिलाना, गीली घास, खाद या दूसरे उपयोग में लेना मिट्टी की गुणवत्ता के लिए बेहतर विकल्प है। लगातार फसल अवशेष जलाने से मिट्टी की जैविक सक्रियता और कार्बनिक पदार्थ पर असर पड़ सकता है।
ICAR में प्रकाशित रिसर्च भी बताती है कि फसल अवशेष जलाने से नाइट्राेजन, फॉसफोरस, सल्फर और पौटेशियम जैसे मूल्यवान पोषक तत्वों का नुकसान हो सकता है। आग लाभकारी सूक्ष्म जीवाणु को भी प्रभावित करती है और ग्रीन हाउस गैसेस, प्रदूषित कण एवं धुआं पैदा करती है।

रोक और जुर्माने से पहले किसान को विकल्प दें :राकेश मालवीय
किसानों एवं समाज के वंचित वर्ग के लिए कार्यरत सामाजिक संगठन विकास संवाद के एसोसिएट डायरेक्टर एवं सामाजिक कार्यकर्ता राकेश मालवीय ने किसान कल्चर से बातचीत में बताया कि किसानों को नरवाई जलाने से पर्यावरण और जमीन को होने वाले नुकसान को लेकर लगातार जागरूक किया जा रहा है।
उनके मुताबिक किसान को यह समझाना जरूरी है कि नरवाई (पराली) केवल बेकार कचरा नहीं है। लेकिन जागरूकता की भी अपनी सीमा है। किसान आमतौर पर उस विकल्प को पहले चुनता है जो कम खर्चीला, कम समय लेने वाला और आसानी से उपलब्ध हो।
मालवीय का कहना है कि केवल कागज पर रोक का आदेश जारी करने और जुर्माना लगाने से नरवाई जलना बंद नहीं होगा। सरकार को ऐसी व्यवस्था तैयार करनी होगी जिसमें नरवाई नहीं जलाने पर किसान को सुविधा या आर्थिक फायदा दिखाई दे।
मशीन सस्ती मिले, गांव में किराये पर उपलब्ध हो, बॉयो डिकंपोजर से मिले, फसल अवशेष उठाने वाला खरीदार हो या फसल अवशेष प्रबंधन लिए इंसेंटिव मिले तो किसान का व्यवहार बदलना आसान होगा।

Pusa Decomposer से गल सकती है नरवाई, लेकिन खेत तक पहुंच जरूरी
नरवाई (पराली) प्रबंधन का एक विकल्प माइक्रोबियल डीकंपोज (सूक्ष्मजीवों द्वारा अपघटन) भी है। ICAR-IARI का Pusa Decomposer फसल अवशेष को खेत में ही गलाने में मदद करता है।
IARI के अनुसार इसके डेमोशट्रेशन में फसल अपशिष्ट करीब 20-25 दिनों में डिकम्पोज हुआ और खेत अगली फसल की बुआई के लिए तैयार किया जा सका। संस्थान इसे मशीनरी के साथ फसल अपशिष्ट प्रबंधन के टिकाऊ विकल्प के रूप में देखता है।
रघुवंशी कहते हैं कि वैज्ञानिकों ने तकनीक विकसित कर दी है तो कृषि विभाग को उसकी जानकारी और उपलब्धता भी किसान तक पहुंचानी चाहिए। यदि डिकंपोजर महंगा होगा, आसानी से उपलब्ध नहीं होगा या किसान को यह पता ही नहीं होगा कि इसका उपयोग कैसे करना है, तो तकनीक प्रयोगशाला से खेत तक नहीं पहुंच पाएगी।
MP में अब लागू है नरवाई / पराली निपटान योजना (Crop Residue Management Scheme)
मध्यप्रदेश के लिए एक महत्वपूर्ण बदलाव यह है कि केंद्र की फसल अपशिष्ट यानी CRM Scheme अब MP में भी लागू है। अगस्त 2026 में कृषि मंत्रालय ने बताया कि यह योजना पंजाब, हरियाणा, उत्तर प्रदेश, मध्यप्रदेश और दिल्ली में लागू की जा रही है।
इस योजना के तहत, अकेले खेती करने वाले व्यक्तिगत किसान को फसल अवशेष प्रबंधन (क्रॉप रेजिड्यू मैनेजमेंट) मशीनरी खरीदने पर 50% वित्तीय सहायता (सब्सिडी) दी जाती है। वहीं, पात्र ग्रामीण उद्यमियों (rural entrepreneurs), सहकारी समितियों (cooperative societies), किसान उत्पादक संगठनों (FPO), स्वयं सहायता समूहों (SHG) और पंचायतों को कस्टम हायरिंग सेंटर (Custom Hiring Centres) स्थापित करने के लिए 80% तक सहायता का प्रावधान है।
इसमें सुपर सीडर (Super Seeder), हैप्पी सीडर (Happy Seeder), सरफेस सीडर (Surface Seeder), जीरो टिल ड्रिल (Zero Till Drill) जैसी इन-सीटू मैनेजमेंट (खेत में ही प्रबंधन करने वाली) मशीनें और बेलर (Baler) तथा स्ट्रॉ रेक (Straw Rake) जैसे एक्स-सीटू कलेक्शन (खेत से बाहर इकट्ठा करने वाले) उपकरण शामिल हैं।
यानी नीति में विकल्प मौजूद हैं। अब सवाल यह है कि कटाई और अगली बोनी के बीच के कुछ महत्वपूर्ण दिनों में ये मशीनें कितने MP किसानों तक पहुंच पाती हैं।
4 मशीन नहीं, गांव स्तर पर चाहिए नरवाई प्रबंधन नेटवर्क
यहीं तीनों पक्ष एक बिंदु पर करीब आते दिखाई देते हैं।
डॉ. मोटवानी मृदा स्वास्थ्य (Soil Health)और अवशेष पुनर्चक्रण (Residue Recycling) को जरूरी मानते हैं। मालवीय किसान को केवल दंड देने के बजाय आर्थिक फायदा और आसान विकल्प देने की बात करते हैं। रघुवंशी की मांग है कि मशीन और डिकंपोजर गांव तक पहुंचे।
ICAR भी एक जैसी व्यवस्था सभी क्षेत्रों पर लागू करने के बजाय स्थानीय जरूरतों के हिसाब से फसल अवशेष प्रबंधन (Crop Residue Management) की रणनीति बनाने पर जोर दे रहा है। अक्टूबर 2025 के एक कार्यक्रम में ICAR के महानिदेशक ने कस्टम हायरिंग सेंटर्स (Custom Hiring Centres) के लिए क्षेत्र विशेष के आधार पर मशीनरी (region-specific machinery) की आवश्यकता बताई थी।
मध्यप्रदेश जैसे बड़े राज्य में इसका अर्थ यह है कि केवल जिला मुख्यालय पर कुछ मशीनें उपलब्ध कर देना पर्याप्त नहीं होगा। कस्टम हायरिंग सेंटर (Custom Hiring Centre) और मशीनरी नेटवर्क गांवों के कलस्टर तक पहुंचना होगा।

नरवाई को कचरा नहीं, कमाई का साधन बनाने की जरूरत
नरवाई (पराली) जलाने से रोकने का सबसे कारगर तरीका शायद यह होगा कि किसान को उसकी आर्थिक कीमत मिले।
फसल के बचे हुए अवशेष (नरवाई/पराली) से बायोमास पैलेट, कोयले जैसी गट्टियां (briquettes), बायोगैस, खाद, बायोचार और कई दूसरी इंडस्ट्रियल चीजें बनाई जा सकती हैं। ICAR भी इसी कोशिश में है कि इस कचरे से काम की चीजें बनाकर किसानों की एक्स्ट्रा कमाई का जरिया तैयार किया जाए।
अगर खेत से नरवाई निकालने, उसे इकट्ठा करने, गट्ठर बनाने और फैक्ट्रियों तक पहुँचाने का सही सिस्टम बन जाए, तो किसानों के लिए पूरा गणित बदल जाएगा। जिस नरवाई को हटाने के लिए आज किसान को जेब से पैसे खर्च करने पड़ते हैं, वही कल उसकी थोड़ी-बहुत कमाई का जरिया बन सकती है।
तभी जुर्माने से ज्यादा ताकतवर कारण किसान के पास होगा, नरवाई न जलाने का फायदा।
94 बनाम 84 चेतावनी है, पंजाब से तुलना अंतिम निष्कर्ष नहीं
मध्यप्रदेश में 94 और पंजाब में 84 satellite fire events का आंकड़ा निश्चित तौर पर ध्यान खींचता है। लेकिन नरवाई (पराली) की समस्या को समझने के लिए केवल इस सीजन में आग लगने की घटनाओं की संख्या (fire-event count) पर्याप्त नहीं है।
सेटेलाइट ने कितनी जगह आग देखी, यह एक महत्वपूर्ण संकेतक है। लेकिन कितना क्षेत्र जला, कितनी मात्रा में नरवाई (पराली) थी और उससे कितना प्रदूषण या मिट्टी की उपजाऊ शक्ति कम (soil damage) हुई है, इसके लिए अलग डाटा की जरूरत है।
इसके बावजूद मध्यप्रदेश के लिए संदेश गंभीर है। ICAR-IARI के 4 अक्टूबर तक के आधिकारिक आंकड़ों में ही MP में 70धान की नरवाई (पराली) जलाने के मामले दर्ज हो चुके थे और अगले दिन TOI की रिपोर्ट में यह संख्या 94 बताई गई।
किसान को दोष देना सबसे आसान रास्ता है, समाधान नहीं। नरवाई प्रबंधन की मशीन खेत तक पहुंचे, decomposer सस्ता और आसानी से उपलब्ध हो, किसान को training मिले और crop residue की आर्थिक कीमत बने, तभी खेत में आग लगाने का आसान विकल्प पीछे छूट सकता है।



