फार्मर आईडी: 11 करोड़ का आंकड़ा, 5 राज्यों में सिर्फ 28,680 बटाईदार दर्ज! आखिर कहां फंसा पेंच?

फार्मर आईडी के जरिए देश में 11 करोड़ किसानों को डिजिटल पहचान देने का लक्ष्य पूरा हो गया है। लेकिन पांच राज्यों में बटाईदारों और पट्टे पर खेती करने वाले पात्र काश्तकारों के महज 28,680 पंजीकरण सामने आए हैं। मध्य प्रदेश में बटाईदारों के अधिकारों के लिए कानून मौजूद है, फिर भी उनकी अलग डिजिटल पहचान बनना कठिन बताया जा रहा है। आखिर जो किसान जमीन का मालिक नहीं, लेकिन खेत में मेहनत वही करता है, उसकी पहचान कैसे होगी?
Table of Contents
किसान कल्चर, भोपाल: जमीन किसी और के नाम, खेती कोई दूसरा करे, तो फार्मर आईडी किसकी बनेगी? देश में 11 करोड़ डिजिटल किसान पहचान बनने की सरकारी उपलब्धि के बीच यह सवाल उन लाखों किसानों के लिए महत्वपूर्ण हो गया है, जो दूसरे की जमीन पर बटाई या पट्टे से खेती करते हैं। कृषि मंत्रालय से जुड़े अधिकारियों के हवाले से सामने आए आंकड़ों के अनुसार, पांच राज्यों में इस श्रेणी के केवल 28,680 पात्र काश्तकार पंजीकृत हुए हैं। इनमें बटाईदार और पट्टेदार दोनों शामिल हैं। दूसरी ओर, मध्य प्रदेश में बटाईदारों के हितों के संरक्षण के लिए कानून होने के बावजूद उनकी अलग फार्मर आईडी बनना व्यावहारिक रूप से कठिन बताया जा रहा है।
किसान कल्चर से बातचीत में राजस्व विभाग से जुड़े सूत्रों ने बताया कि मध्य प्रदेश में बटाईदारों के अधिकारों की सुरक्षा का कानूनी प्रावधान है, लेकिन मौजूदा डिजिटल पंजीकरण प्रक्रिया में वास्तविक खेती करने वाले ऐसे किसानों की अलग पहचान दर्ज करना मुश्किल है। जमीन के रिकॉर्ड में मूल मालिक का नाम होने से समस्या सामने आती है।
केंद्र सरकार ने 23 अक्टूबर 2026 की रात तक 11 करोड़ फार्मर आईडी बनाने का लक्ष्य पूरा करने की घोषणा की थी। केंद्रीय कृषि एवं किसान कल्याण मंत्री शिवराज सिंह चौहान ने 24 अक्टूबर को कहा कि 31 मार्च 2027 तक का लक्ष्य करीब पांच महीने पहले हासिल कर लिया गया। सरकार के अनुसार, डिजिटल पहचान से किसानों को सरकारी योजनाओं, कृषि ऋण, फसल बीमा और आपदा राहत जैसी सेवाओं तक पहुंच आसान होगी।
लेकिन सवाल है कि जिस किसान के नाम जमीन नहीं है, उसकी पहचान कैसे सुनिश्चित होगी?
फार्मर आईडी में बटाईदारों का पेंच: 11 करोड़ के बीच सिर्फ 28,680 पंजीकरण क्यों?
24 अक्टूबर को प्रकाशित द इंडियन एक्सप्रेस की रिपोर्ट में कृषि मंत्रालय के अधिकारियों के हवाले से बताया गया कि उत्तर प्रदेश, तेलंगाना, आंध्र प्रदेश, छत्तीसगढ़ और असम में कुल 28,680 पात्र काश्तकारों का पंजीकरण हुआ है। इस श्रेणी में बटाईदार और पट्टे पर खेती करने वाले किसान शामिल हैं।
यह आंकड़ा देश के सभी बटाईदारों की संख्या नहीं है। यह पांच राज्यों में संबंधित श्रेणी के तहत हुए पंजीकरण का आंकड़ा है। शेष राज्यों में इस श्रेणी में कितने किसानों को डिजिटल पहचान मिली है, इसकी समेकित स्थिति इन आंकड़ों से स्पष्ट नहीं होती।
उसी रिपोर्ट के अनुसार, छह राज्यों में वन अधिकार धारकों के 3,14,298 पंजीकरण भी हुए हैं। यह अलग श्रेणी है और इसे बटाईदारों की संख्या में नहीं जोड़ना चाहिए।
केंद्र सरकार की AgriStack Farmer Registry में जमीन के मालिकाना रिकॉर्ड से अलग वास्तविक खेती करने वालों को भी शामिल करने का प्रावधान है। लेकिन संबंधित राज्य को उनकी पहचान और सत्यापन की प्रक्रिया लागू करनी होती है।
यही डिजिटल व्यवस्था की बड़ी चुनौती है। खेत में काम करने वाला किसान और जमीन के रिकॉर्ड में दर्ज व्यक्ति अलग हों, तो दोनों की पहचान कैसे सुनिश्चित की जाए?
MP में बटाईदार कानून होने के बाद भी फार्मर आईडी बनना कठिन
मध्य प्रदेश में बटाईदार किसानों के अधिकारों के संरक्षण के लिए मध्यप्रदेश भूमिस्वामी एवं बटाईदार के हितों का संरक्षण अधिनियम, 2016 मौजूद है। यह वर्ष 2018 में मध्य प्रदेश अधिनियम क्रमांक 13 के रूप में प्रभावी हुआ।
इस कानून की धारा 4 में भूमिस्वामी और बटाईदार के बीच निर्धारित प्रारूप में सादे कागज पर अनुबंध की व्यवस्था है। समझौते की तीन प्रतियां तैयार की जाती हैं। एक-एक प्रति दोनों पक्षों के पास रहती है, जबकि तीसरी प्रति तहसीलदार को प्रस्तुत की जा सकती है।
कानून में अधिकतम पांच वर्ष की अवधि का अनुबंध करने और आपसी सहमति से उसे आगे बढ़ाने का भी प्रावधान है।
सबसे महत्वपूर्ण बात यह है कि बटाई का अनुबंध करने से बटाईदार को जमीन का मालिकाना अधिकार नहीं मिलता। ऐसे अनुबंध के आधार पर राजस्व अभिलेख में स्वामित्व की नई प्रविष्टि भी नहीं की जाती।
लेकिन फार्मर आईडी बनाते समय जमीन के स्वामित्व से जुड़े रिकॉर्ड महत्वपूर्ण होते हैं। ऐसे में वास्तविक खेती करने वाले बटाईदार की पहचान दर्ज करने के लिए अलग सत्यापन की जरूरत पड़ सकती है।
राजस्व विभाग से जुड़े सूत्रों के अनुसार, मध्य प्रदेश में बटाईदारों के लिए कानून तो मौजूद है, लेकिन उसे डिजिटल किसान पंजीकरण से जोड़ने में व्यावहारिक मुश्किलें हैं।
हालांकि, यह स्थिति किसी कानूनी प्रतिबंध के बराबर नहीं है। राज्य में अब तक कितने बटाईदारों की फार्मर आईडी बनी है, इसका आधिकारिक राज्यव्यापी आंकड़ा उपलब्ध नहीं है।
चंद्रकांत गौड़ बोले, बटाईदार मूल जमीन मालिक पर निर्भर

भारतीय किसान महासंघ के प्रदेश महामंत्री चंद्रकांत गौड़ ने किसान कल्चर से बातचीत में कहा कि उनकी जानकारी में मध्य प्रदेश में बटाईदारों का अलग पंजीकरण नहीं हो रहा है।
उन्होंने कहा, “जो लीज पर लेते हैं, ठेके पर लेते हैं और बटाई पर खेती करते हैं, उनका अभी कोई पंजीकरण नहीं हो रहा है। मूल मालिक की ही पहचान दर्ज हो रही है। उनको उसी पर आश्रित रहना पड़ता है।”
गौड़ का कहना है कि वास्तविक काश्तकार बीज, खाद, सिंचाई और मजदूरी का खर्च उठाता है, लेकिन जमीन का रिकॉर्ड दूसरे व्यक्ति के नाम होने से कई मामलों में उसकी निर्भरता बनी रहती है।
उन्होंने फसल नुकसान और बीमा भुगतान का मुद्दा भी उठाया। उनका कहना है कि यदि राहत या बीमा राशि जमीन मालिक के नाम आती है, तो बटाईदार को उसका हिस्सा मिलने में परेशानी हो सकती है।
गौड़ ने ऑनलाइन पंजीकरण तथा खाद वितरण की व्यवस्थाओं में किसानों को हो रही दिक्कतों का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि नई डिजिटल व्यवस्थाओं की सफलता का आकलन किसानों के वास्तविक अनुभव से किया जाना चाहिए।
इरफान जाफरी बोले, दो-तीन कोशिशों के बाद भी मेरी फार्मर आईडी नहीं बनी

किसान जागृति संघ के प्रमुख इरफान जाफरी ने डिजिटल पंजीकरण की तकनीकी समस्याओं पर सवाल उठाए।
जाफरी ने किसान कल्चर से कहा, “मेरा ही नहीं हुआ। दो-तीन बार कोशिश की, फेल हो गया। हो ही नहीं रहा।”
उनका कहना है कि जब जमीन के मालिक किसानों को भी पंजीकरण में परेशानी आ रही है, तब बटाईदारों के सामने चुनौती और बड़ी हो जाती है।
जाफरी ने ग्रामीण क्षेत्रों में बिना लिखित अनुबंध के खेती करने वालों का सवाल भी उठाया। उन्होंने बताया कि कई मामलों में जमीन मालिक और बटाईदार वर्षों से आपसी समझ के आधार पर खेती की व्यवस्था चला रहे हैं।
ऐसे में यदि वास्तविक किसान से लिखित अनुबंध मांगा जाए और जमीन मालिक समझौता करने को तैयार न हो, तो उसके पंजीकरण का रास्ता क्या होगा?
हालांकि, मध्य प्रदेश में बटाईदारों की फार्मर आईडी के लिए लिखित समझौता अनिवार्य है या नहीं, इसकी विभागीय पुष्टि जरूरी है। जाफरी की अपनी आईडी नहीं बनने का सटीक तकनीकी कारण भी स्वतंत्र रूप से स्पष्ट नहीं हुआ है।
केदार सिरोही बोले, आधार में नाम अलग, जमीन के रिकॉर्ड में अलग

पूर्व सदस्य, कृषि सलाहकार परिषद, मध्यप्रदेश सरकार, केदार सिरोही ने किसान कल्चर से बातचीत में कहा कि फार्मर आईडी बनवाने में जमीन के मालिक किसानों को भी कठिनाइयों का सामना करना पड़ रहा है।
उनके अनुसार, कई किसानों के आधार कार्ड, भूमि रिकॉर्ड और ऑनलाइन पोर्टल में नाम अलग-अलग दर्ज हैं। कहीं पूरा नाम है तो कहीं संक्षिप्त नाम या पिता का नाम अलग तरीके से लिखा हुआ है।
सिरोही ने कहा, “अभी तो जिसके नाम पर जमीन है, उसी किसान की रजिस्ट्री में चुनौतियां हैं। आधार में नाम अलग है, जमीन के रिकॉर्ड में अलग है और पोर्टल पर अलग है। इन सबको सही करने की जरूरत है।”
उन्होंने रिकॉर्ड सुधार के लिए विशेष व्यवस्था बनाने की जरूरत बताई।
सिरोही ने संयुक्त भूमि खातों का मुद्दा भी उठाया। उनके मुताबिक, एक ही परिवार के कई सदस्य खेती करते हैं, लेकिन जमीन के रिकॉर्ड में उनकी भूमिका और डिजिटल पहचान अलग-अलग स्पष्ट करना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
यहां यह ध्यान रखना जरूरी है कि परिवार के हर सदस्य को केवल खेती में योगदान देने के आधार पर अलग पहचान मिलना स्वतः सुनिश्चित नहीं है। पंजीकरण संबंधित सरकारी नियमों के अनुसार ही होगा।
फसल खराब हुई तो बटाईदार को राहत कैसे मिलेगी? कानून में क्या लिखा है?
मध्य प्रदेश के बटाईदार अधिनियम की धारा 7 में प्राकृतिक आपदा या अन्य कारणों से फसल नुकसान होने की स्थिति में राहत और बीमा दावे से जुड़ा प्रावधान है।
कानून के अनुसार, राज्य सरकार से मिलने वाली राहत राशि और बीमा कंपनी के दावा भुगतान में भूमिस्वामी तथा बटाईदार के अधिकार उनके बीच हुए अनुबंध की शर्तों के अनुसार निर्धारित होंगे।
अनुबंध के निर्धारित प्रारूप में दोनों पक्षों के बीच राहत राशि के हिस्से का उल्लेख करने की व्यवस्था भी है।
लेकिन जिन किसानों के पास लिखित बटाई अनुबंध नहीं है, उनके सामने खेती और नुकसान का प्रमाण प्रस्तुत करने की समस्या आ सकती है।
यह भी जरूरी है कि किसी विशेष फसल बीमा योजना में दावा स्वीकार होने और भुगतान की पात्रता उसके अपने नियमों तथा रिकॉर्ड के आधार पर तय होगी।
इसीलिए बटाईदार अधिनियम में अधिकारों का संरक्षण और डिजिटल फार्मर आईडी जारी होना दो अलग प्रक्रियाएं हैं।
फार्मर आईडी से किसानों को क्या फायदा होगा?
केंद्र सरकार के डिजिटल एग्रीकल्चर मिशन के तहत किसान की विशिष्ट डिजिटल पहचान तैयार की जा रही है। इसका उद्देश्य कृषि रिकॉर्ड व्यवस्थित करना और किसानों को अलग-अलग सेवाओं में बार-बार दस्तावेज जमा करने की जरूरत कम करना है।
सरकार के अनुसार, इस व्यवस्था का उपयोग पात्र किसानों को योजनाओं का लाभ पहुंचाने, बैंक ऋण, फसल बीमा, सरकारी खरीद और आपदा राहत जैसी प्रक्रियाओं में किया जा सकता है।
लेकिन डिजिटल पहचान बनने से किसी योजना का लाभ अपने-आप नहीं मिलता। प्रत्येक योजना में पात्रता की अपनी शर्तें लागू होंगी।
बटाईदारों के मामले में सवाल केवल डिजिटल पहचान बनाने का नहीं है। जरूरी यह भी है कि उनकी वास्तविक खेती की भूमिका संबंधित सरकारी रिकॉर्ड में किस तरह सत्यापित होगी।
बटाईदार किसान अपनी फार्मर आईडी के लिए कहां जाएं?
जो किसान दूसरे व्यक्ति की जमीन पर खेती करते हैं, उन्हें अपने राज्य के कृषि विभाग और संबंधित राजस्व कार्यालय से वास्तविक काश्तकारों के पंजीकरण की वर्तमान प्रक्रिया की जानकारी लेनी चाहिए।
मध्य प्रदेश में बटाईदार अधिनियम के तहत अनुबंध की व्यवस्था मौजूद है। लेकिन उस अनुबंध को डिजिटल पंजीकरण के लिए किस रूप में स्वीकार किया जाएगा, इसकी अधिकृत जानकारी जरूरी है।
जिन किसानों के आधार और जमीन के रिकॉर्ड में नाम अलग हैं, वे संबंधित अधिकृत कार्यालय से रिकॉर्ड सुधार की प्रक्रिया पूछ सकते हैं।
किसानों को बिना आधिकारिक पुष्टि के यह नहीं मानना चाहिए कि केवल मौखिक समझौता या बटाई अनुबंध उन्हें निश्चित रूप से डिजिटल पहचान दिला देगा।
11 करोड़ के बाद असली चुनौती, खेत जोतने वाले किसान की पहचान
देश में 11 करोड़ फार्मर आईडी बनना डिजिटल कृषि व्यवस्था के विस्तार की बड़ी उपलब्धि है। लेकिन पांच राज्यों में बटाईदारों और पट्टेदारों सहित केवल 28,680 पात्र काश्तकारों के पंजीकरण का उपलब्ध आंकड़ा एक महत्वपूर्ण सवाल उठाता है।
मध्य प्रदेश में बटाईदारों के लिए कानून मौजूद है, जबकि राजस्व सूत्रों और किसान प्रतिनिधियों ने उनकी अलग डिजिटल पहचान बनने में व्यावहारिक कठिनाइयों की बात कही है।
अब राज्यों को यह स्पष्ट करना होगा कि बिना जमीन के मालिकाना रिकॉर्ड वाले वास्तविक किसानों का सत्यापन कैसे होगा, लिखित अनुबंध नहीं होने पर क्या व्यवस्था है और कितने बटाईदार अब तक डिजिटल रजिस्ट्री से जुड़ सके हैं।
किसान के नाम जमीन होना और किसान का वास्तव में खेती करना हमेशा एक ही बात नहीं है। डिजिटल कृषि व्यवस्था की अगली चुनौती इन दोनों के बीच का अंतर पहचानना है।



