सरसों की खेती: RH 725 किस्म से 36 क्विंटल तक उपज की संभावना, जानें 5 बड़ी खासियतें…

सरसों की खेती में सही किस्म का चुनाव किसानों की कमाई बढ़ाने में अहम भूमिका निभाता है। RH 725 ऐसी उन्नत किस्म है, जिसकी औसत पैदावार 25 से 26 क्विंटल प्रति हेक्टेयर बताई गई है। इसमें करीब 40 प्रतिशत तेल होता है और इसे समय पर बुवाई वाले बारानी क्षेत्रों के लिए भी अनुशंसित किया गया है। हालांकि, इसकी अधिकतम संभावित उपज 36 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जो हर खेत में मिलने की गारंटी नहीं है।
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किसान कल्चर, नई दिल्ली: रबी सीजन में सरसों की बुवाई का समय चल रहा है। ऐसे में किसानों के सामने सबसे बड़ा सवाल है कि कौन-सी किस्म बोई जाए, जिससे लागत के मुकाबले बेहतर उत्पादन मिल सके। खासकर उन किसानों के लिए यह फैसला महत्वपूर्ण है, जिनके पास सिंचाई के सीमित साधन हैं। चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय, हिसार की विकसित RH 725 सरसों की किस्म बेहतर उत्पादन क्षमता के कारण चर्चा में है।
विश्वविद्यालय के आधिकारिक विवरण के अनुसार, RH 725 की औसत उपज 25 से 26 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है, जबकि अधिकतम संभावित उत्पादन 36 क्विंटल प्रति हेक्टेयर दर्ज किया गया है। इसकी एक और खासियत बीज में लगभग 40 प्रतिशत तेल की मात्रा है। हालांकि, किसानों को ध्यान रखना चाहिए कि किस्म की उत्पादन क्षमता और खेत से मिलने वाली वास्तविक पैदावार में अंतर हो सकता है।
1. सरसों की खेती: RH 725 सरसों की किस्म में क्या है खास?
RH 725 को चौधरी चरण सिंह हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय ने विकसित किया है। इस किस्म को वर्ष 2018 में राष्ट्रीय स्तर पर अधिसूचित किया गया था। इसके बीज अपेक्षाकृत मोटे होते हैं और फलियां लंबी होती हैं।
किस्म को समय पर बुवाई वाली तथा वर्षा आधारित खेती की परिस्थितियों के लिए अनुशंसित किया गया है। ऐसे क्षेत्रों में यह किसानों के लिए एक विकल्प हो सकती है, जहां रबी फसल के दौरान सिंचाई की सुविधा सीमित रहती है।
हालांकि, इसका मतलब यह नहीं है कि बिना पर्याप्त नमी के अच्छी पैदावार मिल जाएगी। खेत में उपलब्ध नमी, मिट्टी की गुणवत्ता और मौसम का फसल की बढ़वार पर सीधा असर पड़ता है।
2. सरसों की खेती: एक हेक्टेयर में कितनी सरसों पैदा हो सकती है?
RH 725 की सबसे चर्चित विशेषता इसकी उत्पादन क्षमता है। विश्वविद्यालय के अनुसार, इसकी औसत उपज 25 से 26 क्विंटल प्रति हेक्टेयर है।
इस किस्म की प्रमुख विशेषताएं इस प्रकार हैं:
- औसत उपज: 25 से 26 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
- अधिकतम संभावित उपज: 36 क्विंटल प्रति हेक्टेयर
- तेल की मात्रा: लगभग 40 प्रतिशत
- राष्ट्रीय अधिसूचना का वर्ष: 2018
एक हेक्टेयर लगभग 2.47 एकड़ के बराबर होता है। इस आधार पर किस्म की औसत उपज लगभग 10 से 10.5 क्विंटल प्रति एकड़ बैठती है। लेकिन यह केवल औसत उपज का गणितीय रूपांतरण है, किसी विशेष खेत के लिए उत्पादन की गारंटी नहीं।
वर्ष 2018-19 और 2019-20 के दौरान हरियाणा में किए गए एक अध्ययन में RH 725 की उपज औसतन 2,583 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई थी। अध्ययन में इस किस्म ने परीक्षण में शामिल कुछ अन्य किस्मों के मुकाबले बेहतर प्रदर्शन किया था।

3. करीब 40 प्रतिशत तेल, किसानों को क्या फायदा?
सरसों की खेती में केवल उत्पादन ही नहीं, तेल की मात्रा भी महत्वपूर्ण होती है। RH 725 के बीज में लगभग 40 प्रतिशत तेल दर्ज किया गया है।
अच्छी तेल सामग्री के कारण यह किस्म तिलहन उत्पादन के लिहाज से उपयोगी हो सकती है। हालांकि, किसानों को सिर्फ तेल की मात्रा देखकर अधिक बाजार भाव मिलने की उम्मीद नहीं करनी चाहिए।
सरसों की बिक्री से होने वाली आय स्थानीय मंडी भाव, बीज की गुणवत्ता, नमी, व्यापारियों की मांग और अन्य बाजार परिस्थितियों पर निर्भर करती है।
4. RH 725 की बुवाई का सही समय क्या है?
अक्टूबर का महीना सरसों की खेती के लिहाज से महत्वपूर्ण माना जाता है। हालांकि, अलग-अलग राज्यों और कृषि जलवायु क्षेत्रों में बुवाई का उपयुक्त समय बदल सकता है।
हरियाणा कृषि विश्वविद्यालय के शोध में RH 725 सहित सरसों की किस्मों पर बुवाई की अलग-अलग तारीखों का परीक्षण किया गया। इसमें 16 अक्टूबर की बुवाई पर समग्र रूप से बेहतर उपज दर्ज की गई, जबकि बुवाई में देरी के साथ पैदावार से जुड़े कई गुणों में कमी देखी गई।
वर्ष 2025 में प्रकाशित एक अन्य शोध में भी 20 अक्टूबर की बुवाई पर RH 725 ने 30 अक्टूबर की तुलना में बेहतर प्रदर्शन किया।
इसका मतलब यह नहीं कि सभी किसान 16 या 20 अक्टूबर को ही बुवाई करें। सही समय का चुनाव स्थानीय तापमान, मिट्टी में नमी और कृषि विशेषज्ञों की सलाह के आधार पर करना चाहिए।
5. कम पानी वाले क्षेत्रों में कितनी उपयोगी है यह किस्म?
RH 725 को अधिसूचित क्षेत्रों में समय पर बोई जाने वाली वर्षा आधारित खेती के लिए उपयुक्त बताया गया है। यह उन किसानों के लिए उपयोगी विशेषता है, जिनकी खेती मुख्य रूप से बारिश से मिली मिट्टी की नमी पर निर्भर रहती है।
हालांकि, सिंचाई की जरूरत को केवल एक या दो बार तक सीमित मान लेना सही नहीं होगा। वास्तविक जरूरत खेत की नमी, मिट्टी के प्रकार, मौसम और फसल की अवस्था पर निर्भर करेगी।
फूल आने, फलियां बनने और दाना भरने की अवस्थाओं पर नमी की कमी उत्पादन को प्रभावित कर सकती है। इसलिए किसानों को खेत का निरीक्षण करते हुए स्थानीय कृषि विज्ञान केंद्र की सलाह से सिंचाई करनी चाहिए।
क्या मध्यप्रदेश के किसान भी RH 725 की खेती कर सकते हैं?
मध्यप्रदेश में सरसों की खेती करने वाले किसानों के लिए यह सवाल महत्वपूर्ण है। विश्वविद्यालय के आधिकारिक विवरण में RH 725 को हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, जम्मू और उत्तरी राजस्थान के लिए अधिसूचित बताया गया है।
मध्यप्रदेश इस सूची में शामिल नहीं है। इसलिए प्रदेश के किसानों को इस किस्म की अधिक पैदावार के दावे के आधार पर सीधे बड़े क्षेत्र में बुवाई करने के बजाय कृषि विज्ञान केंद्र या कृषि विश्वविद्यालय से स्थानीय उपयुक्तता की पुष्टि करनी चाहिए।
किसानों को यह भी जांचना चाहिए कि उनके क्षेत्र के लिए कौन-सी किस्में अनुशंसित हैं और उनसे किस तरह के उत्पादन की उम्मीद की जा सकती है।
बीज खरीदने से पहले इन बातों का रखें ध्यान
RH 725 या किसी भी दूसरी उन्नत सरसों किस्म का बीज खरीदते समय किसानों को प्रमाणित और विश्वसनीय स्रोत चुनना चाहिए। बीज के पैकेट पर किस्म का नाम, लॉट नंबर, अंकुरण संबंधी जानकारी और वैधता अवधि जरूर देखें।
बुवाई से पहले खेत की मिट्टी की जांच, उचित बीज दर, संतुलित पोषण और खरपतवार नियंत्रण की योजना बनाना भी जरूरी है। केवल अच्छी किस्म खरीद लेने से अधिक पैदावार सुनिश्चित नहीं होती।
किसान चाहें तो पहले सीमित क्षेत्र में किस्म का प्रदर्शन देखकर अगले सीजन में उसका क्षेत्र बढ़ाने का फैसला कर सकते हैं।
RH 725 से कितनी बढ़ सकती है किसानों की कमाई?
RH 725 की उपज क्षमता आकर्षक है, लेकिन खेती का मुनाफा केवल प्रति हेक्टेयर उत्पादन से तय नहीं होता। बीज, उर्वरक, मजदूरी, सिंचाई, कटाई और परिवहन की लागत निकालने के बाद ही वास्तविक लाभ पता चलता है।
अच्छी उपज मिलने पर भी बाजार भाव कमजोर हुआ तो कमाई प्रभावित हो सकती है। इसी तरह सामान्य उपज पर अच्छा बाजार मूल्य मिलने से किसान को बेहतर रिटर्न मिल सकता है।
इसलिए RH 725 को अधिक उत्पादन की संभावना वाली किस्म के रूप में देखना चाहिए, न कि तय आमदनी देने वाली किस्म के रूप में।



