भावांतर पर भड़का किसान संघ, कीमत का अंतर नहीं, ₹5,708 प्रति क्विंटल MSP पर सोयाबीन खरीदने की मांग

भावांतर योजना को लेकर मध्यप्रदेश में किसानों और सरकार के बीच नई बहस छिड़ गई है। भारतीय किसान संघ ने सोयाबीन की पूरी फसल ₹5,708 प्रति क्विंटल के न्यूनतम समर्थन मूल्य (MSP) पर खरीदने की मांग की है। संगठन का कहना है कि किसानों को मंडी में कम दाम पर फसल बेचने के बाद कीमत का अंतर नहीं चाहिए। सरकार सीधे समर्थन मूल्य पर उपज खरीदे। संघ ने सोयाबीन के अलावा धान, मक्का, मूंग और दूसरी खरीफ फसलों की भी पूरी खरीद MSP पर करने की मांग उठाई है।
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किसान कल्चर, भोपाल: मध्यप्रदेश में सोयाबीन की नई फसल मंडियों में पहुँचने लगी है, लेकिन किसान को उसकी उपज का पूरा दाम कैसे मिलेगा, इस पर विवाद खड़ा हो गया है। भारतीय किसान संघ ने सरकार की भावांतर भुगतान योजना पर सवाल उठाते हुए सीधे MSP पर खरीद की मांग की है। संघ चाहता है कि सरकार किसानों को बाद में कीमत का अंतर देने के बजाय उनकी पूरी फसल घोषित समर्थन मूल्य पर खरीदे।
भोपाल में मंगलवार, 13 अक्टूबर को आयोजित प्रेस कॉन्फ्रेंस में भारतीय किसान संघ ने साफ किया कि वह भावांतर भुगतान के बजाय पूरी फसल की सरकारी खरीद चाहता है। संगठन ने सोयाबीन के साथ धान, मक्का, बाजरा, मूंग, उड़द और मूंगफली को भी समर्थन मूल्य पर खरीदने की मांग की।
भारतीय किसान संघ के प्रदेश अध्यक्ष कमल सिंह आंजना ने कहा कि किसानों को उनकी पूरी उपज का घोषित समर्थन मूल्य मिलना चाहिए। सरकार को भावांतर जैसी व्यवस्था पर निर्भर रहने के बजाय सभी MSP वाली फसलों की शत-प्रतिशत खरीद सुनिश्चित करनी चाहिए। संघ का कहना है कि जब सरकार फसल का न्यूनतम दाम तय करती है, तो किसान को उस दाम पर फसल बेचने का मौका भी मिलना चाहिए।
भावांतर पर विवाद क्यों? सोयाबीन का MSP ₹5,708
केंद्र सरकार ने खरीफ सीजन 2026-27 के लिए सोयाबीन का न्यूनतम समर्थन मूल्य ₹5,708 प्रति क्विंटल तय किया है। पिछले साल यह ₹5,328 था। यानी MSP में ₹380 प्रति क्विंटल की बढ़ोतरी हुई है।
लेकिन MSP बढ़ने का मतलब यह नहीं है कि मंडी में हर किसान को सोयाबीन का इतना ही दाम मिल जाएगा।
मंडियों में सोयाबीन की कीमत मांग, आवक और गुणवत्ता के हिसाब से बदलती रहती है। कई बार किसान को MSP से कम कीमत पर अपनी फसल बेचनी पड़ती है।
इसी परेशानी को देखते हुए सरकार भावांतर भुगतान योजना चला रही है। इसमें किसान मंडी में अपनी फसल बेचता है और सरकार निर्धारित नियमों के मुताबिक कीमत के अंतर की भरपाई करती है।
भारतीय किसान संघ को इसी व्यवस्था पर आपत्ति है। संगठन का कहना है कि किसानों को पूरा MSP मिलना चाहिए, न कि केवल तय मॉडल भाव और समर्थन मूल्य का अंतर।
भावांतर में किसान को कितना पैसा मिलेगा? ऐसे समझिए पूरा हिसाब
मान लीजिए किसी किसान ने मंडी में एक क्विंटल सोयाबीन ₹4,800 में बेचा।
सोयाबीन का घोषित MSP ₹5,708 प्रति क्विंटल है। अब यदि सरकार की गणना के लिए उस अवधि का मॉडल भाव ₹5,000 निर्धारित होता है, तो किसान को भावांतर के रूप में ₹708 मिल सकते हैं।
भावांतर की गणना: काल्पनिक उदाहरण
| सोयाबीन MSP | ₹5,708 |
| मंडी में बिक्री कीमत | ₹4,800 |
| मान लिया गया मॉडल भाव | ₹5,000 |
| संभावित भावांतर राशि | ₹708 |
| किसान को कुल रकम | ₹5,508 |
| MSP से कम प्राप्ति | ₹200 |
यह केवल योजना की गणना समझाने के लिए उदाहरण है, वास्तविक मंडी भाव या घोषित मॉडल भाव नहीं।
इस उदाहरण में किसान को मंडी से ₹4,800 और भावांतर के ₹708 मिलाकर कुल ₹5,508 मिलेंगे। यानी घोषित MSP से ₹200 कम।
यही वह अंतर है जिस पर भारतीय किसान संघ सवाल उठा रहा है।
हालाँकि, वास्तविक भुगतान सरकार के तय मॉडल भाव, मंडी में बिक्री के रिकॉर्ड और योजना की शर्तों के अनुसार होगा।

MSP पर सीधे खरीद और भावांतर में क्या फर्क है?
दोनों व्यवस्थाओं का मकसद किसानों को फसल का बेहतर दाम दिलाना है, लेकिन इनमें एक बड़ा अंतर है।
सीधे MSP पर खरीद में सरकार निर्धारित गुणवत्ता और दूसरी पात्रता शर्तें पूरी करने वाली फसल घोषित समर्थन मूल्य पर खरीदती है। किसान को खरीदी गई उपज का भुगतान उसी हिसाब से किया जाता है।
वहीं भावांतर योजना में किसान अपनी फसल मंडी में बेचता है। इसके बाद सरकार MSP और मॉडल भाव के बीच का अंतर तय नियमों के अनुसार किसान के खाते में भेजती है।
इसका मतलब है कि भावांतर में किसान की कुल प्राप्ति हर स्थिति में घोषित MSP के बराबर हो, यह जरूरी नहीं है।
किसान संघ चाहता है कि सरकार किसानों को इसी अंतर और भुगतान की अनिश्चितता से राहत दे।
सिर्फ सोयाबीन नहीं, 7 फसलों की पूरी खरीद की मांग
भारतीय किसान संघ ने अपनी मांग केवल सोयाबीन तक सीमित नहीं रखी है। संगठन चाहता है कि सरकार खरीफ सीजन की सात प्रमुख फसलों की पूरी उपज MSP पर खरीदे।
इनमें सोयाबीन, धान, मक्का, बाजरा, मूंग, उड़द और मूंगफली शामिल हैं।
संगठन का कहना है कि किसानों को अपनी मेहनत और खेती पर आने वाली लागत के मुकाबले फसल का उचित दाम मिलना चाहिए।
भारतीय किसान संघ की मांग ऐसे समय आई है, जब किसान नई फसल बेचने और आगामी रबी सीजन की तैयारी में जुटे हुए हैं।
इसलिए फसल की बिक्री से मिलने वाला पैसा किसान के लिए अगली बुवाई की तैयारी में भी महत्वपूर्ण भूमिका निभाता है।
सूखे और फसल नुकसान पर भी सरकार से मांगी राहत
भारतीय किसान संघ ने प्रदेश के कई इलाकों में फसलों को हुए नुकसान का मुद्दा भी उठाया है।
संगठन के मुताबिक, कहीं बारिश की कमी तो कहीं ज्यादा बारिश से किसानों को नुकसान हुआ है। जिन जिलों में सूखे जैसे हालात हैं, उन्हें सूखाग्रस्त घोषित कर किसानों को राहत दी जानी चाहिए।
संघ ने फसल नुकसान के आकलन का तरीका बदलने की भी मांग की है।
उसका कहना है कि केवल सैटेलाइट के जरिए नुकसान का अंदाजा लगाना पर्याप्त नहीं है। वास्तविक स्थिति जानने के लिए अधिकारी खेतों में जाकर सर्वे करें।
इसके साथ ही प्रभावित किसानों को जल्द मुआवजा देने और फसल बीमा के लंबित दावों का निपटारा करने की मांग की गई है।
किसानों को 12 घंटे बिजली देने की मांग
किसान संघ ने कृषि बिजली आपूर्ति को लेकर भी सवाल उठाए हैं।
संगठन चाहता है कि खेती और सिंचाई के लिए किसानों को रोजाना 12 घंटे बिना रुकावट बिजली मिले।
इसके अलावा खराब ट्रांसफार्मर तुरंत बदलने और बिजली वितरण स्तर पर कम से कम 10 अतिरिक्त ट्रांसफार्मर रखने की मांग की गई है।
संघ का कहना है कि समय पर बिजली और सिंचाई की व्यवस्था नहीं होने से किसानों की परेशानी बढ़ती है।
रबी सीजन की तैयारी के बीच यह मांग और भी महत्वपूर्ण हो जाती है। खासकर उन इलाकों में जहाँ सिंचाई के लिए किसान बिजली से चलने वाले पंपों पर निर्भर हैं।
सरकार भावांतर योजना पर क्यों दे रही जोर?
मध्यप्रदेश सरकार का मानना है कि भावांतर योजना के जरिए किसानों को मंडी में अपनी फसल बेचने की सुविधा मिलती है और बाजार में कीमत कम होने पर अंतर की राशि दी जा सकती है।
इस व्यवस्था में सरकार को पूरी फसल की खरीद, भंडारण और परिवहन नहीं करना पड़ता।
सरकार इसे किसानों को कीमतों में गिरावट से राहत देने की व्यवस्था के रूप में देखती है।
दूसरी ओर भारतीय किसान संघ का सवाल है कि जब समर्थन मूल्य तय है, तो किसानों को उसी दाम पर पूरी उपज बेचने की सुविधा क्यों नहीं मिलनी चाहिए?
यही दोनों पक्षों के बीच विवाद की मुख्य वजह बन गया है।
हालाँकि, भारतीय किसान संघ की ताजा मांग पर राज्य सरकार की अलग प्रतिक्रिया की पुष्टि नहीं हुई है।
भावांतर के लिए 17 अक्टूबर तक करा सकेंगे पंजीयन
मध्यप्रदेश में खरीफ 2026 की सोयाबीन फसल के लिए भावांतर योजना का पंजीयन 3 अक्टूबर से शुरू हुआ था। घोषित कार्यक्रम के अनुसार इसकी आखिरी तारीख 17 अक्टूबर 2026 है।
इसलिए जिन किसानों ने अभी तक पंजीयन नहीं कराया है, वे निर्धारित समय के भीतर प्रक्रिया पूरी कर सकते हैं।
किसान मध्यप्रदेश के ई-उपार्जन पोर्टल या निर्धारित पंजीयन केंद्रों पर योजना की जानकारी प्राप्त कर सकते हैं।
सरकारी सुविधा केंद्रों पर पंजीयन निःशुल्क है, जबकि अधिकृत निजी सेवा केंद्रों पर निर्धारित शुल्क लग सकता है।
ध्यान देने वाली बात यह है कि भारतीय किसान संघ के विरोध के बावजूद सरकार ने भावांतर योजना बंद करने की घोषणा नहीं की है। इसलिए पात्र किसानों को पंजीयन की अंतिम तारीख का ध्यान रखना चाहिए।
भावांतर या पूरा MSP, किसान के लिए क्या बेहतर?
भावांतर योजना पर उठे सवाल अब सीधे किसानों की कमाई से जुड़ गए हैं।
केंद्र सरकार ने सोयाबीन का MSP ₹5,708 प्रति क्विंटल तय किया है। लेकिन मंडी में फसल की बिक्री किस दाम पर होगी और भावांतर जोड़ने के बाद किसान को कुल कितनी रकम मिलेगी, यह अलग सवाल है।
भारतीय किसान संघ चाहता है कि इस अनिश्चितता को खत्म करके सरकार पूरी उपज सीधे MSP पर खरीदे।
वहीं सरकार भावांतर को बाजार में कीमत गिरने से राहत देने का विकल्प मानती है।
अब देखना होगा कि किसान संघ की मांग के बाद सरकार अपनी व्यवस्था में कोई बदलाव करती है या मौजूदा योजना के तहत ही भुगतान जारी रहेगा।
फिलहाल सोयाबीन किसान के लिए सबसे बड़ा सवाल यही है कि उसकी फसल बिकने के बाद हाथ में पूरे ₹5,708 प्रति क्विंटल आएँगे या नहीं।
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