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Bio Fertilizer: यूरिया-DAP का खर्च घटाने का नया रास्ता? ICAR की 3 तकनीकों में क्या है खास, जानिए किसानों को कैसे मिलेगा फायदा

रिपोर्ट: अनामिका अंबर ओझाKisan Culture
Bio Fertilizer की बोतलों के साथ किसान के हाथों में मिट्टी और हरा पौधा, ICAR की जैव उर्वरक तकनीकों पर सांकेतिक फीचर इमेज।

Bio Fertilizer की तीन तकनीकों ने खेती में खाद के बेहतर इस्तेमाल की नई उम्मीद जगाई है। भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) ने BioNPK, BioGrow और BioPhos को व्यावसायिक उत्पादन के लिए एक निजी कंपनी को सौंपा है। लेकिन सवाल यह है कि क्या इन जैव उर्वरकों से यूरिया-DAP पर निर्भरता घट सकती है? किन फसलों में इनका इस्तेमाल संभव है, ये कब बाजार में मिलेंगे और किसानों को खरीद से पहले क्या जानना चाहिए? जानिए इस नई पहल की पूरी कहानी।

किसान कल्चर, भोपाल: रबी की खेती में खाद की लागत और मिट्टी की कमजोर होती सेहत किसानों की बड़ी चिंता है। इसी बीच ICAR की तीन सूक्ष्मजीव आधारित तकनीकों ने खेती में पोषक तत्वों के प्रबंधन की नई संभावना पैदा की है। उत्तर प्रदेश के मऊ स्थित राष्ट्रीय कृषि महत्त्वपूर्ण सूक्ष्मजीव ब्यूरो (NBAIM) ने BioNPK, BioGrow और BioPhos तकनीकों को तेलंगाना की BhuMicroGen Agrinoculants प्राइवेट लिमिटेड को व्यावसायिक उत्पादन के लिए हस्तांतरित किया है।

12 अगस्त 2026 को नई दिल्ली के कृषि भवन में हुए समझौते का मकसद प्रयोगशाला की तकनीक को खेतों तक पहुंचाना है। ICAR के अनुसार इन उत्पादों से मिट्टी की सेहत सुधारने, पोषक तत्वों के उपयोग की दक्षता बढ़ाने और टिकाऊ खेती को प्रोत्साहन मिलने की उम्मीद है। हालांकि इस समझौते का अर्थ यह नहीं कि तीनों उत्पाद अभी हर कृषि दुकान पर उपलब्ध हैं।

Bio Fertilizer आखिर क्या है और यह खाद से अलग कैसे काम करता है?

Bio Fertilizer यानी जैव उर्वरक में ऐसे लाभकारी सूक्ष्मजीव इस्तेमाल किए जाते हैं, जो पौधों के लिए पोषक तत्व अधिक उपलब्ध कराने में मदद कर सकते हैं। कुछ सूक्ष्मजीव वायुमंडलीय नाइट्रोजन स्थिर करते हैं तो कुछ मिट्टी में मौजूद फॉस्फोरस या पोटैशियम के कम उपलब्ध रूपों को पौधों के उपयोग योग्य बनाने में मदद करते हैं।

इसका मतलब यह नहीं कि हर जैव उर्वरक सभी फसलों की पूरी पोषण जरूरत अकेले पूरी कर देगा। रासायनिक उर्वरक, जैव उर्वरक और जैविक खाद की भूमिकाएं अलग-अलग हैं। सही फैसला मिट्टी की जांच, फसल की मांग और वैज्ञानिक सलाह के आधार पर होना चाहिए।

पहली तकनीक BioNPK: क्या तीन प्रमुख पोषक तत्वों को उपलब्ध कराने में मदद मिलेगी?

Bio Fertilizer इन्फोग्राफिक में ICAR की BioNPK, BioGrow और BioPhos तकनीकें, पौधों के पोषण, मिट्टी की सेहत और किसानों के लिए जरूरी सावधानियां।
ICAR की BioNPK, BioGrow और BioPhos तकनीकों से पोषक तत्व प्रबंधन और मिट्टी की सेहत में सुधार की संभावनाएं। जानिए तीनों तकनीकों की खासियत और किसानों के लिए चार जरूरी सावधानियां।

BioNPK में नाइट्रोजन स्थिरीकरण, फॉस्फेट घुलनशीलता और पोटैशियम घुलनशीलता से जुड़े सूक्ष्मजीव इस्तेमाल किए जाते हैं। ICAR-NBAIM ने किसानों को इस तकनीक के प्रयोग की जानकारी भी दी है। इसका उद्देश्य मिट्टी में मौजूद पोषक तत्वों की उपलब्धता और पौधों द्वारा उनके उपयोग को बेहतर बनाना है।

इसीलिए इस तकनीक को केवल खाद का विकल्प मानने के बजाय संतुलित पोषण प्रबंधन के एक संभावित साधन के तौर पर समझना चाहिए। BioNPK की मात्रा, लगाने की विधि और फसलवार सिफारिश उत्पाद के अधिकृत लेबल तथा स्थानीय कृषि विशेषज्ञ की सलाह से ही तय करें।

दूसरी तकनीक BioGrow: पौधों की बढ़वार में क्या है खास?

BioGrow एक तरल जैव उर्वरक तकनीक है, जिसमें फॉस्फोरस को उपलब्ध कराने और साइडरोफोर बनाने की क्षमता वाले बैक्टीरिया का समूह होता है। भारत सरकार के प्रधान वैज्ञानिक सलाहकार के कार्यालय पर उपलब्ध तकनीकी विवरण में इसे मक्का, टमाटर और कुछ अन्य सोलेनेसी कुल की फसलों के लिए उपयुक्त बताया गया है। इसमें मिट्टी का पीएच 6.5 से 8.5 होने की स्थिति को भी उपयोगी बताया गया है।

यह जानकारी संभावित उपयोग बताती है, लेकिन हर जिले और हर मिट्टी में एक जैसा नतीजा मिलने की गारंटी नहीं है। ऐसा उत्पाद खरीदते समय किसान को देखना चाहिए कि उत्पाद उसकी फसल और मिट्टी के अनुरूप अनुशंसित है या नहीं।

तीसरी तकनीक BioPhos: मिट्टी में मौजूद फॉस्फोरस का बेहतर उपयोग?

फॉस्फोरस जड़ों के विकास और फसल की शुरुआती बढ़वार के लिए जरूरी पोषक तत्व है। मिट्टी में इसकी कुछ मात्रा ऐसे रूपों में मौजूद रहती है, जिसे पौधे आसानी से नहीं ले पाते। फॉस्फेट घुलनशील सूक्ष्मजीव इस पोषक तत्व को अधिक उपलब्ध बनाने में भूमिका निभा सकते हैं।

ICAR-NBAIM ने BioPhos तकनीक पर काम किया है और किसानों के बीच जैव उर्वरक उपयोग का प्रदर्शन भी किया है। BioPhos के किसी व्यावसायिक पैक की अनुशंसित मात्रा, वैधता और प्रयोग विधि को लेकर निर्माता के प्रामाणिक निर्देश देखना जरूरी है।

क्या Bio Fertilizer से यूरिया और DAP का खर्च सचमुच घटेगा?

यह इस खबर का सबसे अहम सवाल है। जैव उर्वरक कुछ परिस्थितियों में पोषक तत्व उपयोग दक्षता सुधारकर रासायनिक खाद पर निर्भरता घटाने में योगदान दे सकते हैं। मगर इन तीन तकनीकों से किसानों का खर्च कितने रुपये या कितने प्रतिशत घटेगा, इसका कोई सार्वभौमिक आंकड़ा इस तकनीक हस्तांतरण घोषणा में नहीं दिया गया है।

इसलिए यूरिया या DAP अचानक बंद कर देना नुकसानदायक हो सकता है। खासकर गेहूं, चना, सरसों और सोयाबीन जैसी फसलों में पोषण प्रबंधन मिट्टी परीक्षण, पहले से मौजूद पोषक तत्वों और फसल की अवस्था के आधार पर तय होना चाहिए। जैव उर्वरकों को वैज्ञानिक रूप से निर्धारित एकीकृत पोषण प्रबंधन के हिस्से के रूप में देखना ज्यादा उचित होगा।

बाजार में कब आएंगे BioNPK, BioGrow और BioPhos?

तीनों तकनीकों को व्यावसायिक उत्पादन के लिए हस्तांतरित करने की घोषणा हो चुकी है। ICAR के अनुसार समझौता BhuMicroGen Agrinoculants प्राइवेट लिमिटेड के साथ किया गया है। हालांकि मूल घोषणा में इन तीन उत्पादों की देशव्यापी खुदरा उपलब्धता, बिक्री मूल्य या सभी राज्यों के वितरकों की सूची नहीं दी गई है।

यह भी जरूरी है कि Bio Fertilizer के नाम से बाजार में बिक रहे किसी दूसरे उत्पाद को इन्हीं ICAR तकनीकों का अधिकृत उत्पाद न मान लिया जाए। खरीद से पहले निर्माता, उत्पाद का पंजीकरण, बैच नंबर और अधिकृत बिक्री संबंधी जानकारी की पुष्टि करें।

मध्यप्रदेश के किसानों के लिए यह तकनीक कितनी उपयोगी?

मध्यप्रदेश में सोयाबीन, गेहूं, चना, सरसों और सब्जियों की खेती बड़े पैमाने पर होती है। ऐसे में मिट्टी की सेहत और पोषक तत्व प्रबंधन से जुड़े नए कृषि उत्पादों की जानकारी प्रदेश के किसानों के लिए उपयोगी है। लेकिन किसी तकनीक को किसी खास फसल के लिए अनुशंसित बताने से पहले स्थानीय मिट्टी, मौसम और फसलवार परीक्षण देखना जरूरी होगा।

प्रदेश के किसान ऐसे जैविक उत्पादों के इस्तेमाल से पहले नजदीकी कृषि विज्ञान केंद्र, कृषि विश्वविद्यालय या कृषि विभाग से सलाह ले सकते हैं। छोटे क्षेत्र में वैज्ञानिक मार्गदर्शन के अनुसार प्रदर्शन कर लागत और परिणाम का रिकॉर्ड रखना भी समझदारी होगी।

Bio Fertilizer खरीदने से पहले ये 5 सावधानियां जरूरी

पहली, कंपनी और उत्पाद का नाम जांचें। दूसरी, पैक की निर्माण और समाप्ति तिथि देखें। तीसरी, फसल तथा इस्तेमाल की विधि का लेबल पढ़ें। चौथी, जैव उर्वरक को लेबल पर लिखी भंडारण शर्तों के अनुसार रखें। पांचवीं, बिना सलाह के रासायनिक खाद की अनुशंसित मात्रा कम न करें।

जैव उर्वरकों में जीवित सूक्ष्मजीवों की गुणवत्ता और सही उपयोग महत्वपूर्ण होता है। गलत भंडारण, गलत मात्रा या अनुपयुक्त फसल में प्रयोग से अपेक्षित परिणाम नहीं मिल सकते।

नई तकनीक से एग्री प्रोडक्ट बाजार को क्या मिलेगा?

ICAR और निजी कंपनी के बीच यह समझौता कृषि अनुसंधान को व्यावसायिक उत्पाद में बदलने की दिशा में एक कदम है। यदि उत्पादन, गुणवत्ता नियंत्रण और वितरण तंत्र सफल रहते हैं, तो किसान इन तकनीकों को कृषि इनपुट बाजार में नए विकल्प के रूप में देख सकेंगे। इससे जैव उर्वरक विनिर्माण, विपणन और तकनीकी परामर्श से जुड़े उद्यमों के लिए अवसर बढ़ सकते हैं।

फिलहाल किसानों के लिए सही संदेश यही है: Bio Fertilizer की इन तीन तकनीकों में संभावना है, लेकिन वास्तविक बचत और फसल उत्पादन पर असर का फैसला विश्वसनीय फसलवार परीक्षणों, लागत और सही उपयोग के आधार पर ही किया जाना चाहिए।