⌖ भोपाल▤ ई-पेपर
आज का भाव LIVEसोयाबीन 4520 ₹/क्विंटल गेहूं 2425 ₹/क्विंटल चना 5650 ₹/क्विंटल

सामुदायिक बीज बैंक: जबलपुर के किसानों ने बचाए मोटे अनाज के दुर्लभ बीज, 30 से अधिक गांवों तक पहुंचा ‘श्रीअन्न’ का खजाना

अक्टूबर 23, 2026
रिपोर्ट: डॉ. सुदीप शुक्लKisan Culture

जबलपुर के आदिवासी अंचल समनापुर में 10 किसानों द्वारा शुरू किया गया ‘सामुदायिक बीज बैंक’ आज विलुप्त हो रहे मोटे अनाजों की 15 से अधिक पारंपरिक किस्मों का सुरक्षा कवच बन चुका है; बिना नकद भुगतान के ‘डेढ़ गुना बीज वापसी’ मॉडल पर चलने वाला यह बैंक न केवल 30 से ज्यादा गांवों के किसानों को आत्मनिर्भर बना रहा है, बल्कि रासायनिक खेती के दौर में पुरखों की धरोहर और शुद्ध पोषण को भी जिंदा रखे हुए है।

किसान कल्चर, जबलपुर: बाजार में हाइब्रिड बीजों की बढ़ती निर्भरता के बीच जब हमारी पारंपरिक देसी फसलें खेतों से धीरे-धीरे गायब हो रही थीं, तब जबलपुर के आदिवासी बहुल इलाके के किसानों ने अपनी मिट्टी और पुरखों की धरोहर को सहेजने का बीड़ा उठाया। जबलपुर विकासखंड के ग्राम समनापुर में करीब एक दशक पहले शुरू किया गया सामुदायिक बीज बैंक आज आसपास के कई गांवों के लिए वरदान साबित हो रहा है। 10 स्थानीय किसानों की छोटी सी पहल से शुरू हुआ यह बैंक आज न केवल विलुप्त हो रहे मोटे अनाज (श्रीअन्न) की देशी प्रजातियों को नया जीवन दे रहा है, बल्कि किसानों को बिना किसी नकद खर्च के बीज भी उपलब्ध करा रहा है।

बरगी बांध के समीप बसे ग्राम समनापुर में संचालित इस सामुदायिक बीज बैंक का मुख्य उद्देश्य कोदो-कुटकी सहित स्थानीय जलवायु के अनुकूल फसलों को संरक्षित करना है, ताकि सूखे और कम बारिश के मौसम में भी किसानों की उपज सुरक्षित रह सके।

सामुदायिक बीज बैंक: कच्चे मकान और चूहों की चुनौती से निकली सफलता की राह

पारंपरिक बीजों को सहेजने का यह सफर जितना सुकून देने वाला दिखता है, इसकी शुरुआत उतनी ही पथरीली थी। सामुदायिक बीज बैंक के अध्यक्ष और वरिष्ठ किसान पूरण लाल सैयाम पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि पहले दो साल तो समझिए एक इम्तिहान की तरह थे। एक छोटे से कच्चे मकान में रखे ये दुर्लभ बीज हमेशा खतरे में रहते थे। जंगल-झाड़ियों और दूर-दराज के गांवों से ढूंढकर लाई गई नस्लों को सीलन और चूहों से बचाना सबसे बड़ा सिरदर्द बन गया था; जरा-सी चूक होती और महीनों की मेहनत चूहे चट कर जाते थे।

हालात तब बदले जब 2014-15 में कृषि विभाग की ‘आत्मा परियोजना’ की नजर इस देसी मुहिम पर पड़ी। विभाग की तरफ से मिले 50 हजार रुपयों ने किसानों की बड़ी चिंता दूर कर दी। इस सहायता से मजबूत, एयर-टाइट कंटेनर और जरूरी उपकरण खरीदे गए। इसके बाद बीजों को सुरक्षित ठिकाना मिला और चूहों व नमी से होने वाला नुकसान पूरी तरह थम गया।

संरक्षित बीजों का भंडार: कोदो-कुटकी से लेकर देशी सब्जियों तक

समनापुर का यह सामुदायिक बीज बैंक आज देशी प्रजातियों का एक जीवंत संग्रहालय बन चुका है। यहां ऐसी फसलें सुरक्षित हैं जो रासायनिक खाद के बिना भी बेहतरीन उत्पादन देती हैं:

  • कोदो: स्थानीय खुटिया और सायरा किस्में।
  • कुटकी: लाल और काली कुटकी की दुर्लभ किस्में।
  • अन्य श्रीअन्न: रागी, देशी कंगनी, देशी जगनी, देशी सवा, करधनी, झल्लार, देशी ज्वार और बाजरा।
  • सब्जियों के देशी बीज: पारंपरिक लाल व हरी भिंडी और देशी लौकी।

‘सवा से डेढ़ गुना’ वापसी का नियम: बिना पैसे के कैसे चलता है यह बैंक?

इस सामुदायिक बीज बैंक की सबसे खूबसूरत बात यह है कि यहां किसी भी किसान से एक रुपया भी नहीं लिया जाता। समनापुर के साथ-साथ बासनपानी, धुवई, मोठार और बम्हनी जैसे आसपास के गांवों के 25 से 30 किसान हर साल बुवाई के लिए यहां से बीज ले जाते हैं।

नियम बिल्कुल सीधा और व्यावहारिक है, किसान बुवाई के लिए जितना बीज ले जाता है, फसल कटने और खलिहान समेटने के बाद उसे उसका डेढ़ गुना (1.5x) शुद्ध बीज बैंक को लौटाना होता है। इस देसी व्यवस्था से बैंक की तिजोरी कभी खाली नहीं होती। भंडार साल-दर-साल बढ़ता रहता है और अगले मौसम में नए किसानों को आसानी से बीज मिल जाता है।

अधिकारियों ने परखा मॉडल, ‘रानी दुर्गावती योजना’ से मिलेगा अतिरिक्त लाभ

हाल ही में मुख्यमंत्री जन विश्वास अभियान के तहत आत्मा परियोजना के अधिकारियों ने समनापुर पहुंचकर इस सामुदायिक बीज बैंक का जायजा लिया। परियोजना संचालक डॉ. इंदिरा त्रिपाठी ने किसानों के इस जमीनी प्रयास की सराहना करते हुए कहा कि बदलती जलवायु और सूखे के दौर में ये पारंपरिक बीज ही हमारी खाद्य सुरक्षा की असली ढाल हैं।

डॉ. त्रिपाठी ने किसानों को मध्य प्रदेश सरकार की रानी दुर्गावती श्रीअन्न प्रोत्साहन योजना से जुड़ने की सलाह दी। उन्होंने बताया कि इस योजना के अंतर्गत कोदो, कुटकी, रागी, ज्वार और बाजरा उगाने वाले पंजीकृत किसानों को सरकार की ओर से ₹1,000 प्रति क्विंटल की प्रोत्साहन राशि सीधे उनके बैंक खाते में दी जा रही है। इससे किसानों को पारंपरिक बीजों के संरक्षण के साथ-साथ अपनी उपज का शानदार मुनाफा भी मिल रहा है।