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Sucess Story : अदरक की खेती से 15 लाख की आय

सितम्बर 19, 2026
Report by: प्राजंली पातुरकरKisan Culture
छिंदवाड़ा के मोहखेड़ विकासखंड के किसान कृपाराम पाठे अदरक की फसल के साथ अपने खेत में, जहां ड्रिप सिंचाई और तकनीकी सलाह से बेहतर उत्पादन मिला।
रिपोर्ट: प्राजंली पातुरकरसंपादन: मृदुल जैन

अदरक की खेती ने छिंदवाड़ा के एक किसान को कम क्षेत्र में बेहतर आमदनी का रास्ता दिखाया है। मोहखेड़ विकासखंड के ग्राम सोनमउ (महलपुर) के किसान कृपाराम पाठे ने केवल 0.400 हेक्टेयर जमीन में अदरक लगाकर करीब 250 क्विंटल उत्पादन हासिल किया। मंडी में 5,000 से 6,000 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बिक्री के बाद उन्हें करीब 15 लाख रुपये की बिक्री आय मिली। किसान के अनुसार, लागत निकालने के बाद शुद्ध आय करीब 14.50 लाख रुपये रही। इस नतीजे में ड्रिप सिंचाई, फसल प्रबंधन और उद्यानिकी विभाग की तकनीकी सलाह की अहम भूमिका रही।

छिंदवाड़ा के किसान कृपाराम पाठे की 0.400 हेक्टेयर में अदरक की खेती, 250 क्विंटल उत्पादन और करीब 15 लाख रुपये बिक्री आय का इन्फोग्राफिक
छिंदवाड़ा जिले के किसान कृपाराम पाठे ने 0.400 हेक्टेयर में अदरक की खेती कर करीब 250 क्विंटल उत्पादन प्राप्त किया। किसान के अनुसार बिक्री से करीब 15 लाख रुपये की आय हुई।

किसान कल्चर, भोपाल: छिंदवाड़ा जिले के मोहखेड़ विकासखंड में एक किसान ने यह दिखाया है कि सीमित जमीन पर भी फसल का सही चुनाव और तकनीकी सलाह आमदनी का बड़ा अंतर पैदा कर सकती है। ग्राम सोनमउ (महलपुर) के किसान कृपाराम पाठे ने अपने खेत में ड्रिप सिंचाई की सुविधा का इस्तेमाल करते हुए उद्यानिकी विभाग की सलाह के अनुसार अदरक की खेती की। उन्होंने कुल 1.800 हेक्टेयर जमीन में से 0.400 हेक्टेयर क्षेत्र चुना और करीब 250 क्विंटल अदरक का उत्पादन प्राप्त किया।

स्रोत के अनुसार, इस उत्पादन की मंडी में बिक्री 5,000 से 6,000 रुपये प्रति क्विंटल की दर से हुई और किसान को करीब 15 लाख रुपये की बिक्री आय मिली। किसान ने अदरक की खेती में कुल खर्च लगभग 60 हजार रुपये बताया है, जिसमें बीज, खेत की तैयारी, खाद, उर्वरक, पोषक तत्व और दवाओं का खर्च शामिल है। किसान के अनुसार लागत निकालने के बाद उन्हें करीब 14.50 लाख रुपये की शुद्ध आय प्राप्त हुई।

अदरक की खेती के लिए 0.400 हेक्टेयर (करीब साढ़े तीन बीघा) जमीन का चुनाव

कृपाराम पाठे के पास कुल 1.800 हेक्टेयर जमीन है। इसके बावजूद उन्होंने पूरी जमीन पर एक साथ अदरक लगाने के बजाय 0.400 हेक्टेयर (करीब साढ़े तीन बीघा) में बुवाई की। उनका उद्देश्य कम जमीन में ऐसी फसल लेना था, जिससे पैदावार के साथ आमदनी भी बेहतर हो सके।

उनके खेत में ड्रिप सिंचाई की सुविधा पहले से मौजूद थी। इसी सुविधा ने फसल की जरूरत के अनुसार पानी देने में मदद की। स्रोत में किसान की खेती का यही अनुभव सामने आता है कि उपलब्ध संसाधनों और सही फसल चयन के साथ सीमित क्षेत्र में भी व्यावसायिक परिणाम हासिल किए जा सकते हैं।

जुलाई 2025 में शुरू हुई अदरक की खेती

उद्यानिकी विभाग की सलाह के बाद किसान ने जुलाई 2025 में 0.400 हेक्टेयर जमीन पर अदरक की खेती शुरू की। खेती के दौरान उन्होंने खेत की तैयारी, खाद और उर्वरक के इस्तेमाल, जरूरी पोषक तत्वों, फसल की देखभाल और सिंचाई पर ध्यान दिया। ये सभी काम विभाग से मिली सलाह के अनुसार किए गए।

अदरक जैसी फसल में शुरुआती तैयारी और बाद की देखभाल दोनों महत्वपूर्ण मानी जाती हैं, लेकिन इस खबर में किसान के खेत पर अपनाए गए उन्हीं तरीकों का उल्लेख है, जिन्हें स्रोत ने दर्ज किया है। किसान ने वैज्ञानिक तरीके से खेती करने और फसल की जरूरत के अनुसार प्रबंधन को अपने उत्पादन से जोड़ा है।

ड्रिप सिंचाई से पानी के इस्तेमाल पर रहा जोर

किसान के खेत में पहले से उपलब्ध ड्रिप सिंचाई व्यवस्था का इस्तेमाल अदरक की फसल के लिए किया गया। स्रोत के मुताबिक, इस व्यवस्था से फसल की जरूरत के अनुसार पानी दिया गया और पानी का सही उपयोग हुआ। इससे पौधों को बेहतर तरीके से बढ़ने में मदद मिली।

कृपाराम पाठे ने केवल सिंचाई ही नहीं, बल्कि खाद, उर्वरक, पोषक तत्व और दवाओं के इस्तेमाल पर भी ध्यान दिया। उद्यानिकी विभाग की तकनीकी सलाह ने उन्हें बुवाई से लेकर फसल की देखभाल तक सही जानकारी उपलब्ध कराई। किसान का कहना है कि जानकारी मिलने से उन्होंने खेती को पहले की तुलना में बेहतर तरीके से किया।

अदरक की खेती में करीब 60 हजार रुपये की लागत

किसान के अनुसार, अदरक की खेती में सबसे बड़ा खर्च बीज पर हुआ। उन्होंने बीज खरीदने पर करीब 36 हजार रुपये खर्च किए। इसके अलावा खेत तैयार करने, खाद, उर्वरक, जरूरी पोषक तत्व और दवाओं पर लगभग 24 हजार रुपये खर्च हुए। इस तरह कुल लागत करीब 60 हजार रुपये रही।

यह लागत किसान द्वारा बताई गई है और इसी आधार पर उन्होंने अपनी आय का आकलन किया। उत्पादन और बिक्री के आंकड़ों के साथ देखें तो इस खेती से प्राप्त बिक्री आय लागत की तुलना में काफी अधिक रही। हालांकि, वास्तविक आमदनी का अंतिम आकलन बिक्री की मात्रा, मंडी दर और खेती से जुड़े अन्य खर्चों के हिसाब से बदल सकता है।

करीब 250 क्विंटल उत्पादन, मंडी में 5,000 से 6,000 रुपये भाव

करीब एक साल की मेहनत के बाद जुलाई 2026 में अदरक की खुदाई शुरू हुई। किसान को लगभग 250 क्विंटल उत्पादन मिला। मंडी में अदरक करीब 5,000 से 6,000 रुपये प्रति क्विंटल की दर से बिका। इसी बिक्री से उन्हें करीब 15 लाख रुपये तक की आय प्राप्त हुई।

कृपाराम पाठे ने बताया कि लागत निकालने के बाद उनकी शुद्ध आय करीब 14.50 लाख रुपये रही। बिक्री आय और शुद्ध आय दोनों आंकड़े किसान के अनुसार हैं। स्रोत में दर्ज मंडी भाव के हिसाब से 250 क्विंटल उत्पादन की संभावित सकल बिक्री लगभग 12.50 लाख से 15 लाख रुपये के बीच बैठती है, इसलिए 15 लाख रुपये की बिक्री आय ऊपरी भाव पर हुई बिक्री के अनुरूप बताई गई है।

तकनीकी सलाह से खेती को लेकर बदला नजरिया

किसान श्री कृपाराम पाठे का कहना है कि अदरक की खेती में उद्यानिकी विभाग की सलाह से उन्हें काफी मदद मिली। बुवाई, सिंचाई और फसल की देखभाल से जुड़ी सही जानकारी के कारण वे खेती को व्यवस्थित तरीके से कर सके। उनके अनुभव में तकनीकी सलाह ने फसल प्रबंधन को समझने और उपलब्ध संसाधनों का बेहतर इस्तेमाल करने में भूमिका निभाई।

अदरक की खेती से मिली आय के बाद किसान का खेती को देखने का नजरिया भी बदला है। उनका मानना है कि आधुनिक तकनीक, सही फसल का चुनाव और विशेषज्ञों की सलाह अपनाकर किसान खेती से बेहतर आमदनी हासिल कर सकते हैं। यह निष्कर्ष उनके अपने खेत और इस फसल से मिले परिणाम पर आधारित है।

छिंदवाड़ा के किसानों के लिए क्या संकेत?

कृपाराम पाठे का मामला यह संकेत देता है कि कम क्षेत्र में भी किसान अपनी आमदनी बढ़ाने की कोशिश कर सकते हैं, अगर फसल का चयन स्थानीय संसाधनों और उपलब्ध तकनीक के हिसाब से किया जाए। उनके पास कुल 1.800 हेक्टेयर जमीन थी, लेकिन उन्होंने अदरक के लिए 0.400 हेक्टेयर क्षेत्र चुना और उसी हिस्से में उत्पादन पर ध्यान केंद्रित किया।

इस अनुभव में तीन बातें प्रमुख रूप से सामने आती हैं: ड्रिप सिंचाई की उपलब्धता, उद्यानिकी विभाग की तकनीकी सलाह और खेती के दौरान वैज्ञानिक प्रबंधन। हालांकि, किसी भी किसान के लिए उत्पादन और आय एक जैसी रहेगी, ऐसा दावा इस स्रोत में नहीं किया गया है। खेत, मौसम, लागत, मंडी भाव और फसल प्रबंधन के आधार पर परिणाम अलग हो सकते हैं।

फिर भी, छिंदवाड़ा के इस किसान की कहानी यह बताती है कि खेती को केवल परंपरागत तरीके से करने के बजाय विभागीय मार्गदर्शन और आधुनिक सिंचाई व्यवस्था के साथ योजना बनाकर किया जाए, तो कम जमीन में भी बेहतर आर्थिक परिणाम की संभावना बन सकती है।

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