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मछली पालन में ऐसा क्या करने जा रहा MP, जिससे होगी ₹5,000 करोड़ की एक्स्ट्रा कमाई! जानिए सरकार का प्लान और 7 बड़े मौके

रिपोर्ट: डॉ. सुदीप शुक्लKisan Culture
मछली पालन से कमाई के लिए मध्यप्रदेश में तालाब और केज कल्चर तकनीक से मछली उत्पादन करते मत्स्य पालक

मछली पालन से कमाई बढ़ाने के लिए मध्यप्रदेश सरकार अब इस क्षेत्र को बड़े एग्री बिजनेस और निर्यात उद्योग के रूप में विकसित करने जा रही है। राज्य में मछली उत्पादन को अगले दो से तीन वर्षों में दोगुने से अधिक करने का लक्ष्य रखा गया है। सरकार का अनुमान है कि इस विस्तार से हर साल करीब ₹5,000 करोड़ की अतिरिक्त आय पैदा हो सकती है और कम से कम 50 हजार लोगों को फायदा मिलेगा। नई मत्स्य नीति से हैचरी, केज कल्चर, फिश फीड, प्रोसेसिंग, कोल्ड चेन और निर्यात जैसे कारोबारों में नए अवसर खुलने की उम्मीद है।

किसान कल्चर, भोपाल: मध्यप्रदेश के तालाब और बड़े जलाशय अब सिर्फ मछली उत्पादन के केंद्र नहीं रहेंगे, बल्कि उनसे जुड़े उद्योग, स्टार्टअप और निर्यात कारोबार भी विकसित किए जाएंगे। प्रदेश सरकार ने मछली उत्पादन को मौजूदा करीब 4.5 लाख टन से बढ़ाकर अगले दो से तीन वर्षों में 10 से 11 लाख टन तक पहुंचाने की महत्वाकांक्षी योजना बनाई है। इसका उद्देश्य किसानों और मछुआरों की मछली पालन से कमाई कराने के साथ प्रदेश में निवेश और रोजगार के नए रास्ते खोलना है।

भोपाल में 23 अक्टूबर को आयोजित फिशरीज इन्वेस्टर्स एंड एक्सपोर्टर्स कॉन्क्लेव 2026 में मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव और केंद्रीय मत्स्य पालन मंत्री राजीव रंजन सिंह की मौजूदगी में मध्यप्रदेश मत्स्य निवेश एवं निर्यात दिशा-निर्देश 2026 जारी किए गए। सम्मेलन में देश-विदेश के निवेशकों, निर्यातकों, स्टार्टअप और एक हजार से ज्यादा मत्स्य पालकों ने भाग लिया।

प्रदेश के मुख्य सचिव अशोक बर्णवाल ने सम्मेलन में कहा कि आधुनिक तकनीकों के सहारे मछली उत्पादन में प्रस्तावित वृद्धि से मत्स्य क्षेत्र में सालाना लगभग ₹5,000 करोड़ की अतिरिक्त आय सृजित होने का अनुमान है। इससे कम से कम 50 हजार लोगों को लाभ मिलने की संभावना है। उन्होंने निवेशकों को उत्पादन, प्रसंस्करण और निर्यात क्षेत्र में भागीदारी के लिए आमंत्रित किया।

मछली पालन से कमाई के ये 7 एग्री बिजनेस बन सकते हैं नए अवसर

मध्यप्रदेश में मछली पालन से कमाई के 7 एग्री बिजनेस अवसर, ₹5,000 करोड़ अतिरिक्त आय का लक्ष्य, केज कल्चर, फिश हैचरी और प्रोसेसिंग का इन्फोग्राफिक।
मछली पालन से कमाई बढ़ाने के लिए मध्यप्रदेश में उत्पादन को 10 से 11 लाख टन तक पहुंचाने का लक्ष्य। जानिए मत्स्य क्षेत्र में कारोबार के 7 बड़े अवसर।

नई नीति और सम्मेलन में घोषित पहलों से संकेत मिलते हैं कि मध्यप्रदेश में मछली पालन का कारोबार केवल मछली बेचने तक सीमित नहीं रहेगा। मछली के उत्पादन से लेकर बाजार तक कई तरह के उद्यम विकसित किए जा सकेंगे।

1. फिश हैचरी और मछली बीज उत्पादन

मछली पालन का सबसे महत्वपूर्ण आधार गुणवत्तापूर्ण मछली बीज है। प्रदेश में उत्पादन बढ़ने के साथ हैचरी और फिंगरलिंग उत्पादन की मांग भी बढ़ सकती है।

युवा उद्यमी और किसान समूह मछली बीज उत्पादन तथा नर्सरी इकाइयों में निवेश की संभावना तलाश सकते हैं। प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत प्रदेश में 78 हैचरी परियोजनाओं को स्वीकृति दिए जाने का उल्लेख भी सरकारी आंकड़ों में किया गया है।

2. केज कल्चर से जलाशयों में मछली पालन

मछली पालन से कमाई के तरीकों में केज कल्चर तकनीक का भी इस्तेमाल किया जाता है। केज कल्चर में बड़े जलाशयों के भीतर जाल और तैरते ढांचों की सहायता से मछलियों को पाला जाता है। इससे पारंपरिक तालाब के अलावा बड़े जलाशयों की उत्पादन क्षमता का भी उपयोग किया जा सकता है।

सरकार इंदिरा सागर सहित बड़े जलाशयों में इस तकनीक के विस्तार पर जोर दे रही है। केंद्रीय राज्य मंत्री एसपी सिंह बघेल ने इंदिरा सागर में एक लाख केज विकसित करने की संभावना का उल्लेख किया।

हालांकि, केज कल्चर शुरू करने के लिए संबंधित विभाग की अनुमति, जलाशय आवंटन और तकनीकी मानकों का पालन आवश्यक होगा।

3. फिश फीड निर्माण का कारोबार

मछली उत्पादन बढ़ने पर गुणवत्तापूर्ण आहार की मांग भी बढ़ती है। इससे फिश फीड निर्माण, पैकेजिंग और वितरण में कारोबार की संभावनाएं बन सकती हैं।

मत्स्य निवेश दिशा-निर्देशों में मछली आहार से जुड़े निवेश को भी प्रोत्साहित करने की बात कही गई है। स्थानीय स्तर पर फीड इकाइयों का विकास होने से मत्स्य पालकों को नियमित आपूर्ति मिलने में मदद हो सकती है। इस तरह सिर्फ मछली पालन से कमाई के अलावा उससे जुड़े उद्योगों के जरिए भी कमाई की जा सकती है।

4. मछली प्रोसेसिंग और रेडी-टू-कुक उत्पाद

मछली पालन से कमाई के तहत बेहतर कीमत हासिल करने के लिए केवल कच्ची मछली बेचना ही विकल्प नहीं है। सफाई, कटिंग, पैकेजिंग, फिश फिलेट और रेडी-टू-कुक उत्पादों के जरिए मूल्य संवर्धन किया जा सकता है।

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने मत्स्य पालन को फूड प्रोसेसिंग उद्योग से जोड़ने की घोषणा की है। इससे प्रसंस्करण इकाइयों और स्थानीय उद्यमों के लिए बाजार विकसित होने की संभावना है।

5. मछली पालन से कमाई : कोल्ड स्टोरेज और रेफ्रिजरेटेड ट्रांसपोर्ट

मछली जल्दी खराब होने वाला उत्पाद है। इसलिए उत्पादन केंद्र से बाजार तक उचित तापमान बनाए रखना आवश्यक है।

सरकार कोल्ड चेन, संग्रह केंद्र, भंडारण और परिवहन सुविधाओं के विकास पर जोर दे रही है। इससे कोल्ड स्टोरेज, इंसुलेटेड वाहन, रेफ्रिजरेटेड ट्रांसपोर्ट और वितरण सेवाओं में निवेश के अवसर बन सकते हैं।

6. मछली निर्यात और पैकेजिंग कारोबार

मध्यप्रदेश जैसे अंतर्देशीय राज्य भी अंतरराष्ट्रीय मछली बाजार में अपनी हिस्सेदारी बढ़ा सकते हैं। विशेष रूप से पंगासियस और तिलापिया जैसी मीठे पानी की मछलियों के निर्यात की संभावनाओं पर ध्यान दिया जा रहा है।

निर्यात के लिए गुणवत्ता प्रमाणन, ट्रेसेबिलिटी, मानक पैकेजिंग और बाजार की मांग के अनुसार उत्पादन जरूरी होगा।

केंद्र सरकार का समुद्री उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण (MPEDA) भी अंतर्देशीय राज्यों के निर्यातकों को बाजार संबंधी जानकारी उपलब्ध कराने में सहयोग करेगा।

7. आधुनिक मत्स्य पालन तकनीक और स्टार्टअप

मछली पालन में तकनीक आधारित कारोबार की भी संभावनाएं बढ़ रही हैं। इनमें बायोफ्लॉक, रीसर्कुलेटरी एक्वाकल्चर सिस्टम (RAS), जल गुणवत्ता जांच, रोग निदान और तकनीकी सेवाएं शामिल हैं।

सरकारी जानकारी के अनुसार प्रदेश में प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के तहत 1,157 आरएएस और बायोफ्लॉक इकाइयों को स्वीकृति दी गई है।

इन तकनीकों से जुड़े उपकरण, रखरखाव, प्रशिक्षण और सलाहकार सेवाओं में भी उद्यमिता के अवसर बन सकते हैं।

₹88.25 करोड़ से 49 जलाशयों और 5 अमृत सरोवरों का विकास

प्रदेश में मत्स्य उत्पादन बढ़ाने के लिए केंद्र सरकार ने एक महत्वपूर्ण परियोजना को स्वीकृति दी है।

केंद्रीय बजट 2026-27 की घोषणा के अनुरूप प्रधानमंत्री मत्स्य संपदा योजना के अंतर्गत मध्यप्रदेश के 49 जलाशयों और पांच अमृत सरोवरों के एकीकृत विकास के लिए लगभग ₹88.25 करोड़ की परियोजना लागत मंजूर की गई है।

इसमें 49 जलाशयों के विकास के लिए ₹87.56 करोड़ और पांच अमृत सरोवरों के लिए ₹69 लाख की स्वीकृत लागत शामिल है।

इन परियोजनाओं का उद्देश्य जलाशयों में मछली उत्पादन बढ़ाने के साथ आधारभूत सुविधाओं और स्थानीय रोजगार को मजबूत बनाना है। सम्मेलन में एकीकृत केज कल्चर इकाइयों का वर्चुअल उद्घाटन भी किया गया।

मध्यप्रदेश के पास 4.50 लाख हेक्टेयर जल क्षेत्र, फिर भी उत्पादन बढ़ाने की गुंजाइश

मध्यप्रदेश में लगभग 4.50 लाख हेक्टेयर अंतर्देशीय जल क्षेत्र उपलब्ध है। इसमें करीब 3.75 लाख हेक्टेयर जलाशय क्षेत्र है।

प्रदेश में रोहू, कतला, मृगल, तिलापिया, पंगासियस, कॉमन कार्प और ग्रास कार्प जैसी प्रजातियों का उत्पादन होता है।

केंद्र सरकार के आंकड़ों के अनुसार प्रदेश में वर्ष 2019-20 में लगभग दो लाख मीट्रिक टन मछली उत्पादन होता था। वर्ष 2024-25 में यह बढ़कर 4.45 लाख मीट्रिक टन पहुंच गया।

यानी पांच वर्षों में प्रदेश के मछली उत्पादन में लगभग 123 प्रतिशत की वृद्धि हुई।

सरकार अब आधुनिक तकनीक, जलाशयों के बेहतर उपयोग और बाजार आधारित व्यवस्था के जरिए इस उत्पादन को अगले स्तर पर ले जाना चाहती है।

मछली पालन को MSME और फूड प्रोसेसिंग उद्योग से जोड़ने की तैयारी

मुख्यमंत्री डॉ. मोहन यादव ने सम्मेलन में तीन प्रमुख पहलों का उल्लेख किया।

पहली पहल के अंतर्गत मत्स्य पालन को खाद्य प्रसंस्करण उद्योग से जोड़ा जाएगा, ताकि प्रोसेसिंग, पैकेजिंग, कोल्ड चेन और वितरण व्यवस्था विकसित की जा सके।

दूसरी पहल में मत्स्य उद्यमों को सूक्ष्म, लघु एवं मध्यम उद्यम (MSME) ढांचे के अंतर्गत सहायता और प्रोत्साहन देने की बात कही गई है।

तीसरी पहल के तहत मत्स्य क्षेत्र के उद्यमों को भूमि आवंटन और आवश्यक सुविधाएं उपलब्ध कराने के लिए मत्स्य नीति 2026 को लागू करने का प्रस्ताव रखा गया है।

इसका महत्व यह है कि मछली पालन से जुड़े छोटे व्यवसाय भविष्य में केवल कृषि या पारंपरिक मत्स्य गतिविधियों तक सीमित रहने के बजाय संगठित उद्योग के रूप में विकसित हो सकेंगे।

हालांकि, किसी विशेष उद्यम को कितनी सब्सिडी, जमीन या वित्तीय सहायता मिलेगी, यह संबंधित योजना की पात्रता और विस्तृत नियमों पर निर्भर करेगा।

निर्यात बाजार में मध्यप्रदेश के लिए क्यों है बड़ा मौका?

भारत का कुल मछली उत्पादन वर्ष 2024-25 में 197.75 लाख मीट्रिक टन रहा। इसमें अंतर्देशीय मत्स्य पालन का योगदान 151.60 लाख मीट्रिक टन था।

वहीं, वर्ष 2025-26 में भारत का समुद्री खाद्य निर्यात ₹73,890 करोड़ के स्तर पर पहुंच गया।

केंद्रीय मत्स्य विभाग के सचिव डॉ. अभिलक्ष लिखी ने बताया कि पंगासियस और तिलापिया जैसी मीठे पानी की मछली प्रजातियों की समुद्री खाद्य निर्यात में हिस्सेदारी फिलहाल करीब दो प्रतिशत है। इसे अगले पांच वर्षों में 10 प्रतिशत तक पहुंचाने का लक्ष्य रखा गया है।

इस लक्ष्य को हासिल करने में मध्यप्रदेश जैसे राज्यों की महत्वपूर्ण भूमिका हो सकती है।

हालांकि, विदेशी बाजार तक पहुंचने के लिए उत्पाद की गुणवत्ता, प्रमाणन, ट्रेसेबिलिटी, कोल्ड चेन और निर्यात नियमों का पालन करना आवश्यक होगा।

छोटे किसानों और युवाओं को क्या फायदा मिल सकता है?

मध्यप्रदेश की इस योजना में सबसे महत्वपूर्ण सवाल यह है कि क्या बड़े निवेश के साथ छोटे मत्स्य पालकों की आय भी बढ़ पाएगी।

अगर मछली उत्पादकों को स्थानीय स्तर पर हैचरी, गुणवत्तापूर्ण फीड, तकनीकी सहायता, कोल्ड चेन और सीधे खरीदारों से जुड़ने की सुविधा मिलती है, तो उन्हें बेहतर बाजार उपलब्ध हो सकता है।

मत्स्य उत्पादक संगठन (FFPO), सहकारी समितियां और किसान समूह मिलकर उत्पादन, खरीद तथा विपणन की लागत कम करने की संभावनाएं तलाश सकते हैं।

वहीं, ग्रामीण युवाओं के लिए बीज उत्पादन, आहार वितरण, उपकरण आपूर्ति, प्रसंस्करण और परिवहन जैसी सेवाओं में स्वरोजगार के अवसर बन सकते हैं।

लेकिन कारोबार की सफलता केवल सरकारी घोषणा से तय नहीं होगी। इसके लिए शुरुआती निवेश, प्रशिक्षण, उत्पादन लागत, स्थानीय बाजार और खरीदारों की उपलब्धता का आकलन करना जरूरी होगा।

₹5,000 करोड़ की अतिरिक्त कमाई कब होगी?

यहां एक बात समझना जरूरी है। सरकार ने ₹5,000 करोड़ की अतिरिक्त आय हासिल होने का दावा नहीं किया है, बल्कि उत्पादन विस्तार के आधार पर भविष्य में इतनी सालाना आय सृजित होने का अनुमान जताया है।

इसके लिए प्रदेश को अगले दो से तीन वर्षों में उत्पादन 4.5 लाख टन से बढ़ाकर 10 से 11 लाख टन तक पहुंचाने की योजना पर काम करना होगा।

इस लक्ष्य की सफलता निवेश, तकनीक, उत्पादकता, प्रसंस्करण सुविधाओं और बाजार तक पहुंच पर निर्भर करेगी।

अगर इन मोर्चों पर अपेक्षित प्रगति होती है, तो मध्यप्रदेश में मछली पालन से कमाई के अवसर केवल पारंपरिक मत्स्य पालकों तक सीमित नहीं रहेंगे, बल्कि ग्रामीण उद्यमियों, किसान समूहों और एग्री बिजनेस स्टार्टअप तक भी फैल सकते हैं।