क्या ₹8,000 के पार जाएंगे चने के भाव? बुवाई से पहले जान लें किसान, 15% तेजी का अनुमान; 3 एक्सपर्ट ने बताया बाजार का गणित

चने के भाव अगले पांच महीनों में 10 से 15 प्रतिशत तक बढ़ सकते हैं। दिल्ली बाजार के मौजूदा लगभग ₹7,200 प्रति क्विंटल के सांकेतिक भाव पर यह तेजी आई तो कीमत ₹8,000 के पार पहुंच सकती है। ऑस्ट्रेलिया में चने का उत्पादन 52 प्रतिशत घटने का अनुमान है, जबकि भारत के प्रमुख उत्पादक राज्यों में पानी की कमी से रबी की बुवाई प्रभावित होने का जोखिम बना हुआ है। ऐसे में किसान बुवाई का फैसला कैसे करें और व्यापारी बाजार से क्या उम्मीद रखें? तीन विशेषज्ञों ने किसान कल्चर को चने की मांग, सरकारी स्टॉक, आयात और कीमतों का पूरा गणित समझाया।
Table of Contents
किसान कल्चर, नई दिल्ली: रबी 2026-27 की बुवाई शुरू हो चुकी है और चने के बाजार में अगले पांच महीनों को लेकर नई चर्चा छिड़ गई है। क्या नई फसल आने से पहले चने के भाव ₹8,000 प्रति क्विंटल के पार पहुंच सकते हैं? इस सवाल ने किसानों से लेकर अनाज व्यापारियों और दाल मिल संचालकों तक की दिलचस्पी बढ़ा दी है। अंतरराष्ट्रीय बाजार में चने की आपूर्ति सीमित होने के संकेत हैं, जबकि भारत के कुछ प्रमुख उत्पादक राज्यों में पानी की कमी बुवाई को प्रभावित कर सकती है। कृषि कमोडिटी विशेषज्ञ मौजूदा परिस्थितियों में 10 से 15 प्रतिशत तक तेजी की संभावना देख रहे हैं।
दिल्ली स्थित कृषि कमोडिटी रिसर्च संस्थान IGrain India Private Limited के डायरेक्टर एवं कमोडिटी विशेषज्ञ राहुल चौहान ने किसान कल्चर से विशेष बातचीत में बताया कि बाजार की अगली दिशा तीन प्रमुख बातों पर निर्भर करेगी। पहली, ऑस्ट्रेलिया से कितना चना भारत पहुंचेगा। दूसरी, NAFED और NCCF जैसी सरकारी एजेंसियां अपने स्टॉक से कितनी बिक्री करेंगी। तीसरी, भारत में रबी सीजन के दौरान चने का वास्तविक रकबा और उत्पादन कितना रहेगा।
राहुल चौहान ने कहा कि सरकारी एजेंसियों के पास लगभग 15 से 17 लाख टन चने का स्टॉक होने का उनका अनुमान है, लेकिन इसकी बिक्री अभी बहुत आक्रामक तरीके से नहीं हो रही। उनके अनुसार, यदि सरकारी एजेंसियां बाजार में अधिक मात्रा में चना नहीं उतारतीं और घरेलू उत्पादन प्रभावित होता है तो अगले कुछ महीनों में कीमतें 10 से 15 प्रतिशत तक बढ़ सकती हैं। हालांकि, उन्होंने 30 से 40 प्रतिशत तेजी के अनुमान को मौजूदा परिस्थितियों में बहुत अधिक बताया।
चने के भाव में 15% तेजी का अनुमान क्यों?

चने की नई फसल की प्रमुख आवक फरवरी-मार्च 2027 से शुरू होने की उम्मीद है। तब तक घरेलू बाजार को पुराने स्टॉक और आयातित चने के सहारे मांग पूरी करनी होगी।
राहुल चौहान के अनुसार, अक्टूबर लगभग समाप्त होने वाला है और नई फसल की आवक तक लगभग पांच महीने का समय है। कमोडिटी बाजार के लिए यह लंबी अवधि है। इस दौरान यदि मांग मजबूत बनी रहती है और नई आपूर्ति सीमित होती है, तो कीमतों को समर्थन मिल सकता है।
उनका अनुमान है कि मौजूदा परिस्थितियों में 10 से 15 प्रतिशत तक तेजी संभव है। हालांकि, इसका अर्थ यह नहीं है कि सभी मंडियों में समान बढ़ोतरी होगी।
उदाहरण के लिए, दिल्ली बाजार का सांकेतिक भाव ₹7,200 प्रति क्विंटल मानें तो 10 प्रतिशत बढ़ोतरी पर कीमत लगभग ₹7,920 और 15 प्रतिशत बढ़ोतरी पर ₹8,280 प्रति क्विंटल हो सकती है।
यह केवल विशेषज्ञ के अनुमान पर आधारित गणना है, किसी निर्धारित लक्ष्य भाव या निश्चित भविष्यवाणी के रूप में नहीं देखी जानी चाहिए।
ऑस्ट्रेलिया में 52% घट सकता है चना उत्पादन, भारत को क्यों है चिंता?
अंतरराष्ट्रीय बाजार में चने की उपलब्धता को लेकर सबसे बड़ा घटनाक्रम ऑस्ट्रेलिया की फसल है।
ऑस्ट्रेलियाई सरकार की कृषि आर्थिक एवं वैज्ञानिक अनुसंधान एजेंसी ABARES के सितंबर 2026 के अनुमान के अनुसार, वर्ष 2026-27 में देश का चना उत्पादन पिछले वर्ष के मुकाबले 52 प्रतिशत घटकर लगभग 10.5 लाख टन रह सकता है।
इस गिरावट का प्रमुख कारण उत्तरी न्यू साउथ वेल्स और क्वींसलैंड जैसे उत्पादक क्षेत्रों में बुवाई का क्षेत्र कम होना तथा अपेक्षाकृत कमजोर पैदावार की संभावना है।
राहुल चौहान के अनुसार, पिछले सीजन में ऑस्ट्रेलिया में लगभग 24 लाख टन चने की फसल का व्यापारिक अनुमान था। इस बार नई फसल लगभग 12 लाख टन तक सीमित रह सकती है।
उनका आकलन है कि पुराने स्टॉक को जोड़ने के बाद भी ऑस्ट्रेलिया के पास कुल लगभग 16 लाख टन चना उपलब्ध हो सकता है। हालांकि, यह बाजार आधारित अनुमान है। आधिकारिक सरकारी पूर्वानुमान और व्यापारिक आकलन में अंतर हो सकता है।
भारत के लिए ऑस्ट्रेलिया इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि वह देसी चने का प्रमुख अंतरराष्ट्रीय आपूर्तिकर्ता है। वहां उत्पादन घटने से भारतीय आयातकों के लिए पर्याप्त मात्रा में चना जुटाना चुनौतीपूर्ण हो सकता है।
पाकिस्तान और बांग्लादेश की खरीद से अंतरराष्ट्रीय बाजार गर्म
ऑस्ट्रेलिया में चने की संभावित कम उपलब्धता के बीच दूसरे आयातक देशों की खरीद भी बढ़ रही है।
राहुल चौहान के अनुसार, पाकिस्तान और बांग्लादेश आगामी महीनों की घरेलू मांग को ध्यान में रखते हुए चने की खरीद में सक्रिय हैं। फरवरी में रमजान की संभावित शुरुआत से पहले खाद्य पदार्थों के लिए स्टॉक जुटाने की कोशिश भी मांग को प्रभावित कर रही है।
ऑस्ट्रेलिया की बाजार रिपोर्टों में पाकिस्तान, बांग्लादेश और संयुक्त अरब अमीरात की मजबूत मांग के संकेत मिले हैं।
चौहान ने बताया कि यदि ऑस्ट्रेलिया के पास नई फसल और पुराना स्टॉक मिलाकर लगभग 16 लाख टन चना रहता है, तो भारत को मिलने वाली मात्रा दूसरे देशों की खरीद पर निर्भर करेगी।
उनका आकलन है कि ऐसी परिस्थिति में भारत को ऑस्ट्रेलिया से 10 लाख टन चना मिलना भी बड़ा आंकड़ा होगा।
हालांकि, विदेशी बाजार में फसल की उपलब्धता, निर्यात सौदे, परिवहन लागत और खरीदार देशों की मांग बदलने पर वास्तविक आयात मात्रा भी बदल सकती है।
NAFED के पास चने का स्टॉक, फिर भी बाजार में मजबूती क्यों?
भारत के चना बाजार की दिशा तय करने में सरकारी बफर स्टॉक की महत्वपूर्ण भूमिका है।
राहुल चौहान का अनुमान है कि सरकारी एजेंसियों के पास लगभग 15 से 17 लाख टन चना मौजूद है। हालांकि, इस मात्रा की अद्यतन आधिकारिक पुष्टि अभी नहीं हुई है।
चौहान के अनुसार, NAFED बाजार में स्टॉक की बिक्री कर रहा है, लेकिन बिक्री की गति और मात्रा इतनी अधिक नहीं है कि बाजार भाव पर बड़ा दबाव बन सके।
उनका मानना है कि यदि सरकार चने की कीमतों को नियंत्रित रखना चाहती है तो NAFED और NCCF जैसी एजेंसियों के माध्यम से अधिक मात्रा में माल बाजार में उतारने पर विचार किया जा सकता है।
सरकारी स्टॉक की अधिक बिक्री से उपलब्धता बढ़ सकती है और दाल मिलों तथा उपभोक्ताओं को राहत मिलने की संभावना बन सकती है।
हालांकि, इसका दूसरा पहलू भी है। बाजार में बड़ी मात्रा में चना आने से किसानों को मिलने वाले भाव पर दबाव पड़ सकता है। इसलिए सरकार को महंगाई नियंत्रण और उत्पादकों के हितों के बीच संतुलन बनाना होगा।
महाराष्ट्र में पानी की कमी, मध्यप्रदेश में बढ़ सकता है चने का रकबा
महाराष्ट्र देश के प्रमुख चना उत्पादक राज्यों में शामिल है। राजस्थान और मध्यप्रदेश भी देश के बड़े चना उत्पादक हैं।
इस वर्ष महाराष्ट्र, कर्नाटक और आंध्रप्रदेश के कई कृषि क्षेत्रों में कमजोर बारिश तथा पानी की उपलब्धता को लेकर चिंता बनी हुई है।
राहुल चौहान का कहना है कि यदि इन क्षेत्रों में आने वाले दिनों में पर्याप्त नमी नहीं मिलती, तो चने की बुवाई प्रभावित हो सकती है।
हालांकि, महाराष्ट्र सहित इन राज्यों में रबी 2026-27 के दौरान चने के रकबे में कितनी कमी आएगी, इसका अंतिम सरकारी अनुमान अभी उपलब्ध नहीं है।
दूसरी ओर मध्यप्रदेश में चने की खेती को लेकर बाजार से अलग संकेत मिल रहे हैं।
अशोकनगर के अनाज-तिलहन व्यापारी कल्याण संघ के जिला सचिव एवं अमित ट्रेडिंग कॉर्पोरेशन के संचालक अमित जैन का मानना है कि प्रदेश में इस बार चने का रकबा घटने के बजाय बढ़ सकता है।
उन्होंने किसान कल्चर से बातचीत में कहा कि सिंचाई के लिए सीमित पानी होने के कारण किसान गेहूं के मुकाबले चना, मसूर और धनिया जैसी फसलों को प्राथमिकता दे सकते हैं।
जैन के अनुसार, अधिक सिंचाई वाली गेहूं की खेती प्रभावित हो सकती है। दूसरी ओर गेहूं की कुछ कम पानी वाली किस्मों की बुवाई बढ़ने की संभावना भी है।
हालांकि, चने का वास्तविक रकबा सरकारी बुवाई आंकड़े आने के बाद ही स्पष्ट होगा।
मध्यप्रदेश में चने के भाव ₹6,500 से ₹6,700, दिल्ली में ₹7,200

अमित जैन के मुताबिक मध्यप्रदेश की प्रमुख मंडियों में चने का भाव फिलहाल लगभग ₹6,500 से ₹6,700 प्रति क्विंटल चल रहा है।
वहीं, दिल्ली बाजार में भाव करीब ₹7,200 प्रति क्विंटल बताया जा रहा है।
उन्होंने कहा कि पिछले वर्ष की समान अवधि के मुकाबले चना लगभग ₹500 प्रति क्विंटल महंगा है।
हालांकि, बाजार में पिछले कुछ दिनों के दौरान नरमी भी दर्ज हुई है। कुछ मंडियों में पहले लगभग ₹7,000 प्रति क्विंटल तक बिकने वाला चना अब ₹6,500 से ₹6,700 के आसपास कारोबार कर रहा है।
जैन के अनुसार, महाराष्ट्र में कमजोर बारिश और बुवाई प्रभावित होने की संभावना आगे चलकर चने के बाजार को समर्थन दे सकती है।
फिलहाल ये भाव कारोबारी से प्राप्त सांकेतिक कीमतें हैं। विभिन्न मंडियों में गुणवत्ता, किस्म और कारोबार की तारीख के अनुसार भाव अलग हो सकते हैं।
आयात पर बढ़ती निर्भरता से दाल मिल उद्योग परेशान

चने के बाजार में संभावित तेजी के बीच दाल प्रसंस्करण उद्योग की अपनी समस्याएं हैं।
इंदौर के पालदा औद्योगिक क्षेत्र के दाल मिल संचालक कोमल अग्रवाल का कहना है कि दलहन के मामले में भारत की विदेशी आपूर्ति पर निर्भरता लगातार बढ़ रही है।
उन्होंने किसान कल्चर से बातचीत में बताया कि मांग और आपूर्ति की मौजूदा स्थिति को देखते हुए बाजार में मांग मजबूत रहने की संभावना है। लेकिन घरेलू दाल मिल उद्योग के लिए यह स्थिति पूरी तरह अनुकूल नहीं है।
अग्रवाल के मुताबिक मध्यप्रदेश के उद्योगों को परिवहन, कर और दूसरे कारोबारी खर्चों के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार से प्रतिस्पर्धा करने में मुश्किल होती है।
उन्होंने कहा, “दलहन के मामले में हम दिन-प्रतिदिन आयात पर निर्भर होते जा रहे हैं। मध्यप्रदेश में भाड़ा, टैक्सेशन और दूसरे खर्च अधिक हैं। इसका असर हमारे कारोबार पर पड़ रहा है।”
अग्रवाल का दावा है कि बढ़ती लागत और प्रतिस्पर्धा की वजह से प्रदेश में कई दाल प्रसंस्करण इकाइयां प्रभावित हुई हैं और कुछ बंद भी हो चुकी हैं।
हालांकि, बंद इकाइयों की संख्या और उनके बंद होने के वास्तविक कारणों के संबंध में स्वतंत्र आधिकारिक आंकड़े उपलब्ध नहीं हैं।
दाल मिलों की लागत बढ़ी तो उपभोक्ताओं पर भी पड़ेगा असर
कोमल अग्रवाल का कहना है कि घरेलू दाल उद्योग को केवल कच्चे माल की कीमतों से ही चुनौती नहीं मिल रही, बल्कि परिवहन और कारोबारी लागत भी महत्वपूर्ण समस्या है।
उनके अनुसार, लघु उद्योग भारती सहित औद्योगिक संगठन लंबे समय से संबंधित विभागों के सामने उद्योग की समस्याएं उठा रहे हैं।
इस स्थिति में चने के भाव बढ़ने का असर अलग-अलग वर्गों पर अलग तरीके से पड़ सकता है।
किसानों को अपनी उपज के बेहतर दाम मिलने की संभावना बन सकती है, लेकिन दाल मिलों की कच्चे माल की लागत बढ़ सकती है। दूसरी ओर, चना दाल, बेसन और उससे बने खाद्य पदार्थों की कीमतों पर भी दबाव पड़ सकता है।
हालांकि, कच्चे चने के भाव में जितनी वृद्धि होती है, खुदरा स्तर पर उतनी ही वृद्धि होना जरूरी नहीं है। प्रसंस्करण लागत, उपलब्ध स्टॉक, प्रतिस्पर्धा और खुदरा बाजार की मांग भी अंतिम कीमत तय करती है।
त्यौहारी मांग खत्म होने से चने के बाजार में आई नरमी
चने के भाव में हाल में आई गिरावट के पीछे त्योहारी मांग का कम होना भी एक कारण माना जा रहा है।
राहुल चौहान के अनुसार, दशहरे से पहले बेसन, नमकीन और अन्य खाद्य उत्पादों की थोक मांग बढ़ी थी। इससे चने के बाजार को समर्थन मिला।
त्योहारी खरीद का बड़ा हिस्सा पूरा होने के बाद बाजार में नरमी दिखाई दी।
चौहान ने बताया कि भारतीय बंदरगाहों पर पीली मटर की बड़ी खेप पहुंचने से भी चने के बाजार पर असर पड़ा।
कुछ खाद्य उपयोगों में पीली मटर चने का विकल्प बन सकती है। ऐसे में जब पीली मटर की उपलब्धता बढ़ती है तो चने की मांग का कुछ हिस्सा प्रभावित हो सकता है।
हालांकि, दोनों उत्पादों की गुणवत्ता, उपयोग और बाजार अलग-अलग हैं। इसलिए पीली मटर का चने की कीमतों पर असर हर परिस्थिति में एक जैसा नहीं होता।
भारत को चना आयात करने की जरूरत क्यों पड़ती है?
भारत विश्व के प्रमुख चना उत्पादक और उपभोक्ता देशों में शामिल है। घरेलू उत्पादन बड़ा होने के बावजूद कुछ वर्षों में मांग और आपूर्ति का अंतर पूरा करने के लिए विदेशों से चना आयात किया जाता है।
भारत के लिए ऑस्ट्रेलिया और तंजानिया प्रमुख देसी चना आपूर्तिकर्ता रहे हैं।
अंतरराष्ट्रीय बाजार में नई फसल कम होने और दूसरे देशों की मांग बढ़ने से भारत के लिए आयात की लागत बढ़ सकती है।
हालांकि, आयात पर निर्भरता का वास्तविक स्तर हर वर्ष घरेलू उत्पादन, सरकारी भंडार और बाजार की मांग के अनुसार बदलता है।
इसके अलावा सरकार की आयात शुल्क नीति भी व्यापारियों के फैसलों को प्रभावित करती है।
इसलिए चने की कीमतों की दिशा समझने के लिए केवल भारत की रबी फसल नहीं, बल्कि अंतरराष्ट्रीय बाजार की गतिविधियों को भी देखना जरूरी है।
क्या ₹8,000 के पार जाएंगे चने के भाव?
इस समय बाजार का सबसे बड़ा सवाल यही है।
दिल्ली के सांकेतिक बाजार भाव ₹7,200 प्रति क्विंटल को आधार मानें तो 10 प्रतिशत तेजी आने पर चना करीब ₹7,920 और 15 प्रतिशत तेजी पर ₹8,280 प्रति क्विंटल तक पहुंच सकता है।
राहुल चौहान के अनुसार, वर्तमान घरेलू और अंतरराष्ट्रीय परिस्थितियों को देखते हुए 10 से 15 प्रतिशत तक की तेजी का अनुमान लगाया जा सकता है। लेकिन उन्होंने इसे निश्चित नहीं बताया है।
यदि NAFED और अन्य सरकारी एजेंसियां बड़ी मात्रा में चना बाजार में उतारती हैं, आयात अपेक्षा से अधिक होता है या भारत में चने की बुवाई और उत्पादन बेहतर रहता है, तो संभावित तेजी सीमित हो सकती है।
इसके विपरीत, यदि महाराष्ट्र सहित अन्य प्रमुख उत्पादक क्षेत्रों में बुवाई कमजोर रहती है और ऑस्ट्रेलिया से आयातित चने की उपलब्धता घटती है, तो कीमतों को समर्थन मिल सकता है।
बुवाई से पहले किसान और व्यापारी किन बातों पर रखें नजर?
रबी की बुवाई कर रहे किसानों के लिए इस समय सबसे महत्वपूर्ण सवाल उपयुक्त फसल का चुनाव है।
मध्यप्रदेश के कुछ क्षेत्रों में पानी की कमी के कारण गेहूं के बजाय चना, मसूर और दूसरी अपेक्षाकृत कम सिंचाई वाली फसलों की ओर रुझान बढ़ने की संभावना है।
लेकिन केवल भविष्य में चने के ऊंचे भाव मिलने की उम्मीद पर फसल का चुनाव करना सही नहीं होगा। किसानों को खेत की नमी, मिट्टी की स्थिति, उपलब्ध सिंचाई, बीज की गुणवत्ता और उत्पादन लागत को ध्यान में रखना चाहिए।
व्यापारियों के लिए सरकारी स्टॉक की बिक्री, ऑस्ट्रेलिया की वास्तविक फसल, पाकिस्तान-बांग्लादेश की खरीद और भारत में रबी की बुवाई के आंकड़े महत्वपूर्ण होंगे।
दाल मिल संचालकों को कच्चे माल की उपलब्धता के साथ लागत, आयातित माल की प्रतिस्पर्धा और प्रसंस्करण मांग पर नजर रखनी होगी।
तीनों विशेषज्ञों के आकलन का सार यही है कि चने के बाजार में आने वाले महीनों के दौरान तेजी की संभावना बनी हुई है, लेकिन कीमतों की वास्तविक दिशा कई घरेलू और अंतरराष्ट्रीय कारकों से तय होगी।
फिलहाल किसानों के लिए बुवाई का फैसला और व्यापारियों के लिए स्टॉक प्रबंधन, दोनों ही महत्वपूर्ण हो गए हैं।

