सोयाबीन भावांतर योजना 2026: मंडी में कम भाव, भुगतान भी अनिश्चित, किसान संगठनों ने उठाए सवाल

सोयाबीन भावांतर योजना 2026 की बिक्री अवधि शुरू होते ही मध्यप्रदेश के तीन किसान संगठनों ने इसके वास्तविक लाभ पर सवाल उठाए हैं। उनका आरोप है कि व्यापारियों को भावांतर मिलने की जानकारी होने पर वे मंडी में उपज की बोली घटा देते हैं। छोटे किसानों को जरूरत के चलते कम भाव पर फसल बेचनी पड़ती है, जबकि सरकारी अंतर राशि के भुगतान में देरी की भी शिकायत है। किसान संगठनों ने ₹5,708 प्रति क्विंटल MSP पर सीधी खरीद की मांग करते हुए पूछा है कि जब समर्थन मूल्य घोषित है, तो किसानों को पूरी कीमत की गारंटी क्यों नहीं मिलती?
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किसान कल्चर, भोपाल/अशोकनगर: मध्यप्रदेश में सोयाबीन भावांतर योजना के तहत उपज की पात्र बिक्री 22 अक्टूबर से शुरू हो गई है, लेकिन किसान संगठन इसे राहत से ज्यादा अधूरी मूल्य सुरक्षा मान रहे हैं। उनका कहना है कि सरकार की भावांतर राशि मिलना और किसानों को उनकी फसल का पूरा समर्थन मूल्य मिलना दो अलग बातें हैं। व्यापारियों की कम बोली, मॉडल रेट की शर्त और भुगतान की अनिश्चितता के कारण किसानों को नुकसान उठाना पड़ सकता है।
किसान कल्चर ने इस मुद्दे पर तीन अलग-अलग किसान संगठनों के प्रतिनिधियों से बातचीत की। राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ की युवा इकाई के अध्यक्ष अभिषेक रघुवंशी ‘शहबाजपुर’ ने व्यापारियों पर खरीद की कीमत घटाने का आरोप लगाया। भारतीय किसान संघ के प्रांत महामंत्री शिवनंदन सिंह रघुवंशी ने छोटे किसानों की मजबूरी और मॉडल रेट की समस्या उठाई। वहीं भारतीय किसान यूनियन (एकता सिद्धूपुर) के प्रदेश महासचिव जसदेव सिंह नट ने भावांतर भुगतान की निश्चित समयसीमा और पुराने बकाये पर सवाल उठाए।
अभिषेक रघुवंशी ने कहा, “भावांतर सरकार चला तो देती है, लेकिन खरीदने वालों को पता रहता है कि किसान को सरकार से ₹1,000 मिलने हैं। वे वही ₹1,000 मंडी में कम कर देते हैं।” उनका आरोप है कि इस वजह से अच्छी गुणवत्ता की उपज बेचने वाले किसानों को भी उचित मूल्य नहीं मिल पाता।
सोयाबीन भावांतर योजना 2026 में व्यापारियों की बोली पर सवाल :राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ

अभिषेक रघुवंशी ‘शहबाजपुर’, अध्यक्ष (युवा इकाई), राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ, मध्यप्रदेश ने कहा कि भावांतर का पैसा मिलने की प्रक्रिया अपने आप में बड़ी समस्या नहीं है। सही दस्तावेज होने पर किसानों को सामान्यतः भुगतान मिल जाता है।
लेकिन उनके अनुसार, किसानों का नुकसान मंडी में उपज बेचते समय शुरू हो जाता है।
रघुवंशी ने आरोप लगाया कि व्यापारियों को पहले से अंदाजा होता है कि सरकार किसान को कितनी अंतर राशि देगी। इसलिए वे उपज का बाजार भाव कम लगाते हैं। इससे भावांतर योजना का अपेक्षित लाभ किसानों तक नहीं पहुँच पाता।
उन्होंने कहा कि किसान फसल बोने से पहले MSP, सिंचाई की उपलब्धता, अनुमानित पैदावार और लागत को ध्यान में रखकर निर्णय करता है। लेकिन फसल तैयार होने पर MSP से कम कीमत मिलने से उसका पूरा आर्थिक आकलन बिगड़ जाता है।
रघुवंशी ने सोयाबीन सहित अन्य फसलों की MSP पर प्रत्यक्ष खरीद को किसानों के लिए अधिक लाभकारी बताया।
हालाँकि, व्यापारियों द्वारा योजनाबद्ध ढंग से बोली घटाने के इस आरोप की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसके लिए मंडियों के वास्तविक सौदों और व्यापारियों का पक्ष लेना आवश्यक है।
छोटे किसान कब तक रोककर रखें फसल: भारतीय किसान संघ

भारतीय किसान संघ, मध्य भारत प्रांत के प्रांत महामंत्री शिवनंदन सिंह रघुवंशी ने भावांतर योजना में छोटे किसानों की स्थिति को लेकर चिंता जताई है।
उन्होंने कहा कि जिन किसानों के पास केवल 10 से 20 क्विंटल उपज होती है, वे बेहतर कीमत मिलने के इंतजार में उसे लंबे समय तक नहीं रख सकते। उन्हें परिवार के खर्च, खेती की लागत और अगली फसल की तैयारी के लिए उपज बेचनी पड़ती है।
रघुवंशी ने कहा कि MSP पर खरीद की व्यवस्था किसान को एक निश्चित न्यूनतम कीमत का भरोसा देती है। इसके विपरीत भावांतर में मॉडल रेट और वास्तविक बिक्री मूल्य के बीच अंतर के कारण पूरी MSP मिलना जरूरी नहीं है।
उनका कहना है कि किसान को अपनी उपज मंडी में बेचते समय ही यह स्पष्ट होना चाहिए कि उसे न्यूनतम कितनी राशि मिलेगी।
उन्होंने यह आरोप भी लगाया कि कुछ लोग छोटे किसानों से उपज खरीदकर दूसरे किसानों के नाम पर बिक्री दिखाते हैं और योजना का लाभ लेने की कोशिश करते हैं।
इस कथित दुरुपयोग की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। इसकी जाँच के लिए वास्तविक विक्रेता, किसान पंजीयन, मंडी बिक्री पर्ची और भुगतान का रिकॉर्ड मिलाना आवश्यक होगा।
भुगतान के संबंध में शिवनंदन सिंह ने कहा कि पिछली भावांतर योजना में राशि मिलने को लेकर उन्हें बड़ी समस्या की जानकारी नहीं थी, हालाँकि कुछ मामलों में देरी हो सकती है।
भावांतर भुगतान कब मिलेगा, कोई निश्चित समयसीमा नहीं: भारतीय किसान यूनियन (एकता सिद्धूपुर)

भारतीय किसान यूनियन (एकता सिद्धूपुर) के प्रदेश महासचिव जसदेव सिंह नट ने भुगतान की समयसीमा को लेकर अलग चिंता जताई है।
उन्होंने किसान कल्चर से कहा कि किसान मंडी में फसल बेच देता है और संबंधित दस्तावेज जमा कर देता है, लेकिन उसे यह स्पष्ट नहीं होता कि सरकारी भावांतर राशि कितने दिनों में मिलेगी।
जसदेव सिंह नट के मुताबिक, शुरुआत में भुगतान अपेक्षाकृत जल्दी हो सकता है, लेकिन मंडियों में आवक बढ़ने के बाद इसमें देरी की समस्या सामने आ सकती है।
उन्होंने आरोप लगाया कि पूर्व में शिवराज सिंह चौहान के मुख्यमंत्री कार्यकाल के दौरान लागू एक भावांतर योजना के अंतिम चरण में कुछ किसानों को भुगतान नहीं मिला था।
इस दावे की स्वतंत्र पुष्टि नहीं हुई है। संबंधित योजना की अवधि, किसानों का विवरण और सरकारी भुगतान रिकॉर्ड मिलने के बाद ही किसी बकाया राशि की पुष्टि की जा सकती है।
नट ने कहा कि किसानों को अपनी उपज की कीमत का भरोसा बुवाई से पहले होना चाहिए। उनके अनुसार, किसान को यह निश्चितता मिलनी चाहिए कि फसल लेकर मंडी पहुँचने पर वह घोषित न्यूनतम कीमत से नीचे नहीं बिकेगी।
उन्होंने MSP पर खरीद की व्यवस्था और कृषि उपज के लिए न्यूनतम मूल्य की कानूनी गारंटी की मांग दोहराई।
तीन किसान संगठन, भुगतान को लेकर अलग-अलग अनुभव
सोयाबीन भावांतर योजना 2026 को लेकर तीनों किसान नेताओं की शिकायतों में एक साझा बात है। सभी का मानना है कि मंडियों में उपज का का उचित मूल्य मिलना सबसे महत्वपूर्ण है।
हालाँकि, सरकारी भुगतान के पिछले अनुभवों को लेकर सभी की राय अलग-अलग है।
राष्ट्रीय किसान मजदूर संघ के अभिषेक रघुवंशी ने कहा कि दस्तावेज सही होने पर सामान्यतः भावांतर भुगतान मिल जाता है।
भारतीय किसान संघ के शिवनंदन सिंह रघुवंशी ने भी पिछली योजना के भुगतान को लेकर बड़ी परेशानी नहीं होने की बात कही, हालाँकि उन्होंने यह जरूर कहा कि बहुत बार भुगतान की समय-सीमा बढ़ जाता है, लेकिन किसान को उसका पेमेंट मिल जाता है।
वहीं भारतीय किसान यूनियन (एकता सिद्धूपुर) के जसदेव सिंह नट ने भुगतान की अनिश्चित समयसीमा और कुछ पुराने मामलों में राशि नहीं मिलने का आरोप लगाया।
ये बयान अलग-अलग किसान नेताओं के अनुभव और दावों पर आधारित हैं। इनसे पूरे प्रदेश में भुगतान की वास्तविक स्थिति का निष्कर्ष नहीं निकाला जा सकता।
सोयाबीन भावांतर योजना 2026 : ₹5,708 MSP के बावजूद किसानों को कम पैसा कैसे मिल सकता है?
सोयाबीन भावांतर योजना 2026 के लिए खरीफ विपणन सीजन 2026-27 में पीली सोयाबीन का न्यूनतम समर्थन मूल्य ₹5,708 प्रति क्विंटल निर्धारित है।
योजना में मॉडल रेट का महत्वपूर्ण स्थान है। यह प्रदेश की मंडियों में हुई बिक्री के भाव और मात्रा के भारित औसत से तय किया जाता है।
यदि किसान की वास्तविक बिक्री कीमत मॉडल रेट से कम है, तो भावांतर की गणना मॉडल रेट के आधार पर की जाती है।
उदाहरण के लिए मान लीजिए मॉडल रेट ₹4,500 प्रति क्विंटल है, जबकि किसान ने सोयाबीन ₹4,000 प्रति क्विंटल में बेची।
ऐसी स्थिति में पात्रता के अनुसार संभावित भावांतर ₹1,208 प्रति क्विंटल होगा।
मंडी से मिले ₹4,000 और सरकारी भावांतर के ₹1,208 जोड़ने पर किसान को कुल ₹5,208 प्राप्त होंगे।
यानी घोषित MSP से ₹500 कम।
यह सिर्फ गणना समझाने का काल्पनिक उदाहरण है। ₹4,500 किसी वास्तविक दिन का घोषित मॉडल रेट नहीं है।
इसके विपरीत यदि उसी मॉडल रेट पर किसान अपनी उपज ₹4,800 में बेचता है, तो पात्रता के अनुसार ₹908 का भावांतर मिलने पर कुल राशि ₹5,708 हो सकती है।
इस तरह मंडी में किसान को मिलने वाली वास्तविक कीमत का महत्व बना रहता है।
सोयाबीन भावांतर योजना 2026 में मॉडल रेट कैसे तय होगा?

सरकार ने मॉडल रेट तय करने के लिए मंडियों में हुई बिक्री का भारित औसत आधार बनाया है।
योजना संबंधी प्रकाशित नियमों के अनुसार, सीजन के शुरुआती 14 दिनों का मॉडल रेट प्रदेश की मंडियों के भारित औसत से निर्धारित किया जाएगा।
इसके बाद पिछले 14 दिनों की बिक्री के आँकड़ों के आधार पर प्रतिदिन नया मॉडल रेट तैयार किया जाएगा और उसे ई-मंडी पोर्टल पर प्रदर्शित किया जाना है।
यदि मंडी में सोयाबीन MSP या उससे अधिक कीमत पर बिकती है तो भावांतर भुगतान नहीं मिलेगा।
वहीं MSP से कम लेकिन मॉडल रेट से अधिक भाव मिलने पर संबंधित वास्तविक बिक्री मूल्य के आधार पर अंतर की गणना होगी।
मॉडल रेट से कम कीमत पर बिक्री होने पर किसान को मॉडल रेट के आधार पर निर्धारित अंतर राशि ही मिलेगी।
यही प्रावधान किसान संगठनों की चिंताओं का एक प्रमुख कारण है।
सोयाबीन भावांतर योजना 2026 में पंजीयन और बिक्री की तारीख
मध्यप्रदेश सरकार ने सोयाबीन भावांतर योजना के तहत पंजीयन की अंतिम तारीख बढ़ाकर 24 अक्टूबर 2026 कर दी है।
इससे पहले अंतिम तारीख 17 अक्टूबर निर्धारित थी।
योजना के लिए अधिसूचित मंडियों में पात्र सोयाबीन बिक्री की अवधि 22 अक्टूबर 2026 से 15 जनवरी 2027 तक निर्धारित है।
भावांतर भुगतान की पात्र मात्रा किसान के पंजीकृत रकबे और निर्धारित औसत उत्पादकता के आधार पर तय की जाएगी।
इसलिए किसानों को पंजीयन, रकबे, बैंक खाते और बिक्री से संबंधित विवरण सही रखने होंगे।
मंडी में फसल बेचते समय तौल पर्ची, विक्रय मूल्य और संबंधित भुगतान दस्तावेज सुरक्षित रखना भी जरूरी है।
MSP पर सीधी खरीद से क्या बदलेगा?
तीनों किसान संगठनों ने भावांतर के मुकाबले MSP पर प्रत्यक्ष खरीद को बेहतर विकल्प बताया है।
MSP पर सरकारी खरीद की व्यवस्था में निर्धारित पात्रता और गुणवत्ता मानकों को पूरा करने वाली उपज की खरीद घोषित समर्थन मूल्य पर की जाती है।
इसके विपरीत भावांतर में किसान बाजार में अपनी फसल बेचता है और सरकार निर्धारित नियमों के अनुसार अंतर राशि देती है।
दोनों व्यवस्थाओं में कीमत तय होने और भुगतान मिलने की प्रक्रिया अलग है।
हालाँकि, सरकारी खरीद में भी खरीद केंद्रों की उपलब्धता, गुणवत्ता संबंधी शर्तें और समय पर भुगतान जैसी चुनौतियाँ हो सकती हैं।
किसान संगठनों की मांग है कि बाजार में फसल बेचने के समय न्यूनतम मूल्य की स्पष्ट गारंटी हो, ताकि किसान को बाद में मिलने वाली सरकारी सहायता पर निर्भर न रहना पड़े।
अब सरकार और मंडी व्यापारियों से किन सवालों का जवाब जरूरी?
सोयाबीन भावांतर योजना 2026 में किसान संगठनों के आरोपों के बाद सबसे बड़ा सवाल मंडी में वास्तविक खरीद की कीमत का है।
क्या भावांतर योजना लागू होने के बाद व्यापारियों की बोली प्रभावित हो रही है? क्या मॉडल रेट से कम कीमत पर बिक्री करने वाले किसानों की संख्या बढ़ रही है? क्या छोटे किसानों को अपनी उपज तत्काल बेचने के कारण अपेक्षाकृत कम कीमत मिलती है?
दूसरा महत्वपूर्ण सवाल भुगतान की समयसीमा का है। सरकार भावांतर राशि कितने दिनों में किसानों के खातों में भेजेगी और क्या पुराने भुगतान के कोई मामले लंबित हैं?
तीसरा मुद्दा योजना के संभावित दुरुपयोग से जुड़ा है। किसान के नाम पर होने वाली बिक्री का सत्यापन किस प्रकार किया जाता है?
इन सवालों पर मंडी प्रशासन, कृषि विभाग और व्यापारियों का पक्ष तथा बिक्री रिकॉर्ड मिलना आवश्यक है।
फिलहाल तीन किसान संगठनों के प्रतिनिधियों ने किसान कल्चर से बातचीत में एक साझा मांग रखी है कि किसानों को उपज का न्यूनतम मूल्य सुनिश्चित किया जाए।
किसानों के लिए असली सवाल केवल भावांतर की राशि मिलने का नहीं, बल्कि फसल बेचने के बाद उनके हाथ में आने वाली कुल रकम का है।
