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मिशन दलहन आत्मनिर्भरता: ₹500 करोड़ का रिसर्च फंड, एक साल में एक भी प्रोजेक्ट मंजूर नहीं, 419 प्रस्ताव लंबित

अक्टूबर 22, 2026
रिपोर्ट: मृदुल जैनKisan Culture
मिशन दलहन आत्मनिर्भरता के तहत अरहर की खेती और दलहन अनुसंधान की चुनौतियाँ

मिशन दलहन आत्मनिर्भरता के तहत कृषि अनुसंधान के लिए रखे गए ₹500 करोड़ से पहले वर्ष में एक भी परियोजना मंजूर नहीं हुई है। देशभर के अनुसंधान संस्थानों से 419 प्रस्ताव मिलने के बावजूद स्वीकृति की प्रक्रिया पूरी नहीं हो सकी। Financial Express की रिपोर्ट में सामने आए इस मामले के बाद कैबिनेट सचिवालय ने 15 नवंबर 2026 तक प्रक्रिया पूरी करने को कहा है। सवाल यह है कि जब सरकार को 2030-31 तक दलहन उत्पादन 350 लाख टन पहुँचाना है, तो नई किस्मों और कृषि तकनीकों पर अनुसंधान की रफ्तार इतनी धीमी क्यों है?

किसान कल्चर, भोपाल: देश में दलहन उत्पादन बढ़ाने और आयात पर निर्भरता घटाने की सरकारी योजना के सामने एक महत्वपूर्ण चुनौती सामने आई है। केंद्र सरकार के ₹11,440 करोड़ के मिशन दलहन आत्मनिर्भरता में वैज्ञानिक अनुसंधान के लिए ₹500 करोड़ का प्रावधान किया गया है, लेकिन मिशन शुरू होने के एक साल बाद भी इसके अंतर्गत किसी शोध परियोजना को मंजूरी नहीं मिल सकी है। कृषि मंत्रालय को देशभर से 419 प्रस्ताव मिले हैं, जिनकी समीक्षा चल रही है।

अंग्रेजी आर्थिक समाचार पत्र Financial Express ने 19 अक्टूबर 2026 को प्रकाशित अपनी रिपोर्ट में इस देरी का खुलासा किया है। रिपोर्ट के मुताबिक, कैबिनेट सचिव टी.वी. सोमनाथन की अध्यक्षता में पांच अक्टूबर को हुई समीक्षा बैठक में अनुसंधान परियोजनाओं की मंजूरी का मुद्दा उठा। कैबिनेट सचिवालय ने कृषि एवं किसान कल्याण मंत्रालय को 15 नवंबर तक मंजूरी प्रक्रिया पूरी करने के निर्देश दिए हैं।

यह स्थिति इसलिए महत्वपूर्ण है क्योंकि दलहन उत्पादन बढ़ाने के लिए केवल खेती का रकबा बढ़ाना पर्याप्त नहीं है। किसानों को ऐसी नई किस्में भी चाहिए जो कम पानी में अच्छा उत्पादन दें, रोगों का बेहतर सामना कर सकें और बदलते मौसम के अनुकूल हों। वैज्ञानिक अनुसंधान इन जरूरतों को पूरा करने का प्रमुख आधार है।

मिशन दलहन आत्मनिर्भरता के 419 प्रस्ताव कहाँ से आए?

Financial Express की रिपोर्ट के अनुसार, कृषि मंत्रालय ने अनुसंधान के प्राथमिकता वाले क्षेत्रों की पहचान करने के बाद देशभर के संस्थानों से प्रस्ताव माँगे थे।

कुल 419 प्रस्ताव प्राप्त हुए। इनमें भारतीय कृषि अनुसंधान परिषद (ICAR) के संस्थानों से 125 और राज्य कृषि विश्वविद्यालयों से 249 प्रस्ताव आए।

इसके अलावा अन्य सरकारी विश्वविद्यालयों, अनुसंधान संस्थानों और सार्वजनिक क्षेत्र के उपक्रमों से 14 तथा निजी विश्वविद्यालयों से पांच प्रस्ताव मिले। इन चार श्रेणियों में 393 प्रस्तावों का विवरण दिया गया है। शेष 26 प्रस्तावों की संस्थागत श्रेणी रिपोर्ट में स्पष्ट नहीं की गई है।

कृषि मंत्रालय के मुताबिक, प्राप्त प्रस्तावों की वैज्ञानिक और तकनीकी जाँच की जा रही है। स्क्रीनिंग समिति ने प्राथमिकताओं के अनुरूप कुछ प्रस्तावों को अगले चरण के लिए चुना है।

इसके बाद शोधकर्ताओं को राष्ट्रीय स्तर की अनुसंधान एवं विकास समिति के सामने अपनी परियोजनाएँ प्रस्तुत करनी हैं। इस समिति में कृषि मंत्रालय के वरिष्ठ अधिकारी, ICAR के वैज्ञानिक, मिशन अधिकारी और विषय विशेषज्ञ शामिल हैं।

मिशन दलहन आत्मनिर्भरता: अक्टूबर तक मंजूरी का दावा, 15 नवंबर की समयसीमा

Financial Express के अनुसार, कृषि मंत्रालय ने कहा है कि वैज्ञानिक गुणवत्ता, किसानों को संभावित लाभ, तकनीक के व्यावहारिक उपयोग और पहले से चल रहे शोध से समानता जैसे पहलुओं पर प्रस्तावों का मूल्यांकन किया जा रहा है।

समिति की तीन बैठकों में कई प्रस्तावों को मंजूरी के लिए शॉर्टलिस्ट किया गया है।

हालांकि, शॉर्टलिस्ट किए जाने और औपचारिक रूप से परियोजना स्वीकृत होने में अंतर है।

मंत्रालय ने पात्र परियोजनाओं को अक्टूबर 2026 के अंत तक मंजूरी देने की उम्मीद जताई है। दूसरी ओर कैबिनेट सचिवालय ने 15 नवंबर तक प्रक्रिया पूरी करने की समयसीमा तय की है।

अब देखना होगा कि 419 प्रस्तावों में से कितने मंजूर होते हैं, किन संस्थानों को राशि मिलती है और शोध कार्य कब शुरू होता है।

₹11,440 करोड़ का मिशन, 350 लाख टन दलहन उत्पादन का लक्ष्य

केंद्र सरकार ने एक अक्टूबर 2025 को मिशन दलहन आत्मनिर्भरता को मंजूरी दी थी। प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी ने 11 अक्टूबर 2025 को इसे शुरू किया।

योजना की कुल लागत ₹11,440 करोड़ है और इसका क्रियान्वयन 2025-26 से 2030-31 तक होना है।

सरकार ने 2030-31 तक देश का दलहन उत्पादन 350 लाख टन पहुँचाने का लक्ष्य रखा है। आधार वर्ष 2023-24 में यह 242 लाख टन था।

इसका मतलब है कि छह वर्षों में उत्पादन लगभग 45 प्रतिशत बढ़ाना होगा।

योजना के अंतर्गत दलहन की खेती का क्षेत्रफल 275 लाख हेक्टेयर से बढ़ाकर 310 लाख हेक्टेयर और औसत उत्पादकता 881 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर से बढ़ाकर 1,130 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर करने का लक्ष्य है।

मिशन में विशेष जोर अरहर, उड़द और मसूर पर है। उन्नत बीज, जलवायु-अनुकूल किस्में, कटाई के बाद भंडारण और प्रसंस्करण सुविधाओं के विस्तार को भी इसमें शामिल किया गया है।

सरकार ने चार वर्षों तक निर्धारित नियमों के अनुसार अरहर, उड़द और मसूर की न्यूनतम समर्थन मूल्य पर खरीद की व्यवस्था का भी प्रावधान किया है।

मिशन दलहन आत्मनिर्भरता में रिसर्च की देरी किसानों को कैसे प्रभावित करेगी?

किसानों के लिए नई कृषि तकनीक तैयार करना एक लंबी प्रक्रिया है। इसमें शोध, खेतों में परीक्षण, प्रदर्शन और फिर बीज या तकनीक का व्यापक विस्तार शामिल होता है।

यदि किसी नई किस्म में रोग प्रतिरोधक क्षमता या सूखा सहने की क्षमता बढ़ानी है, तो उसके लिए वैज्ञानिक परीक्षण जरूरी होते हैं।

इसी तरह मशीनी कटाई के अनुकूल पौधों का विकास, गुणवत्तापूर्ण बीज उत्पादन और फसल कटाई के बाद होने वाले नुकसान को कम करने के उपाय भी अनुसंधान पर निर्भर करते हैं।

नई परियोजनाओं की मंजूरी में देरी होने से इन पर प्रस्तावित शोध शुरू होने में विलंब हो सकता है। इससे भविष्य में विकसित होने वाली तकनीकों को किसानों तक पहुँचाने की समयसीमा भी प्रभावित होने की आशंका है।

हालांकि, इसका यह अर्थ नहीं है कि देश में पहले से चल रहा दलहन अनुसंधान बंद हो गया है। ₹500 करोड़ के इस नए अनुसंधान घटक की परियोजनाओं में देरी और अन्य मौजूदा अनुसंधान कार्यक्रम अलग विषय हैं।

अरहर को उपेक्षा नहीं, वैज्ञानिक रणनीति और निवेश चाहिए: दीपक पारीक

कृषि अर्थशास्त्री दीपक पारीक का फोटो-कोट, जिसमें अरहर की खेती, जैव प्रौद्योगिकी और दलहन अनुसंधान में निवेश बढ़ाने की जरूरत बताई गई है।
अरहर को जलवायु-अनुकूल और अधिक उत्पादक फसल बनाने के लिए वैज्ञानिक अनुसंधान, उन्नत बीज और जैव प्रौद्योगिकी में निवेश जरूरी है। कृषि अर्थशास्त्री दीपक पारीक के LinkedIn लेख के विचारों पर आधारित फोटो-कोट।

कृषि अर्थशास्त्री एवं कृषि प्रौद्योगिकी रणनीतिकार दीपक पारीक ने भी अरहर में आधुनिक अनुसंधान और निवेश बढ़ाने की आवश्यकता पर जोर दिया है।

अपनी एक LinkedIn पोस्ट में उन्होंने अरहर को जलवायु-अनुकूल खेती, मिट्टी के स्वास्थ्य और पोषण सुरक्षा के लिए महत्वपूर्ण फसल बताया है।

पारीक के अनुसार, सूखा सहन करने की क्षमता, नाइट्रोजन स्थिरीकरण और प्रोटीन के महत्वपूर्ण स्रोत होने के बावजूद अरहर को लंबे समय तक गेहूं, चावल और मक्का जैसी प्रमुख फसलों की तुलना में अनुसंधान और निवेश में कम प्राथमिकता मिली।

उन्होंने अरहर की कम उत्पादकता, रोगों का प्रकोप और मशीनी कटाई के अनुकूल किस्मों की कमी को महत्वपूर्ण चुनौतियाँ बताया है।

पारीक का मानना है कि आधुनिक जीनोमिक्स, हाइब्रिड बीज और CRISPR जैसी जीन एडिटिंग तकनीकों से अरहर की खेती में बड़े बदलाव की संभावनाएँ हैं।

इन तकनीकों के माध्यम से भविष्य में ऐसी किस्में विकसित की जा सकती हैं जो अपेक्षाकृत कम ऊँचाई वाली हों, एक समान समय पर पकें, रोगों के प्रति अधिक सहनशील हों और मशीनी कटाई के अनुकूल बन सकें।

पारीक ने इस फसल को वैज्ञानिक रणनीति, निवेश, बेहतर बीज व्यवस्था और बड़े पैमाने पर विस्तार देने की आवश्यकता बताई है।

दीपक पारीक की यह टिप्पणी ₹500 करोड़ के रिसर्च फंड की मंजूरी में देरी पर प्रतिक्रिया के तौर पर नहीं है, लेकिन इस खबर के साथ पारीक जी की लिंकडइन पोस्ट की सम-सामायिकता है, क्योंकि वे भी दलहन में शामिल अरहर (तुअर) से जुड़ी वैज्ञानिक संभावनाओं और शोध की बात कर रहे हैं। यह टिप्पणी दीपक की प्रकाशित स्वतंत्र LinkedIn पोस्ट का अंग्रेजी से हिंदी अनुवाद है।

लिंक पर क्लिक कर पढ़ सकते हैं अंग्रेजी में लिखी गई दीपक पारीक जी की ओरिजनल लिंकडइन पोस्ट

दलहन उत्पादन बढ़ा, फिर भी 350 लाख टन का लक्ष्य चुनौतीपूर्ण

Financial Express की रिपोर्ट में कृषि मंत्रालय के तीसरे अग्रिम अनुमानों का भी उल्लेख किया गया है।

इन आँकड़ों के अनुसार, 2025-26 में देश का दलहन उत्पादन बढ़कर 274.1 लाख टन होने का अनुमान है, जो पिछले वर्ष के मुकाबले 6.7 प्रतिशत अधिक है।

दलहन की खेती का क्षेत्रफल 277.2 लाख हेक्टेयर से बढ़कर 286.5 लाख हेक्टेयर और औसत उत्पादकता 957 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर दर्ज की गई है।

यह प्रगति सकारात्मक संकेत देती है, लेकिन 2030-31 के 350 लाख टन के लक्ष्य तक पहुँचने के लिए उत्पादन और उत्पादकता में आगे भी वृद्धि आवश्यक होगी।

मौजूदा वृद्धि को ₹500 करोड़ के नए रिसर्च फंड की उपलब्धि नहीं माना जा सकता, क्योंकि इस घटक की परियोजनाओं की स्वीकृति अभी लंबित बताई गई है।

मध्यप्रदेश के चना, मसूर और अरहर उत्पादकों के लिए क्या मायने?

मध्यप्रदेश में चना, मसूर, अरहर और अन्य दलहनी फसलें किसानों की आजीविका का महत्वपूर्ण हिस्सा हैं।

प्रदेश के अलग-अलग इलाकों में मिट्टी, वर्षा और सिंचाई की परिस्थितियाँ बदलती हैं। कहीं कम पानी में खेती की चुनौती है तो कहीं रोगों और कीटों से फसल प्रभावित होती है।

ऐसे में बेहतर बीज, स्थानीय परिस्थितियों के अनुरूप किस्में और कम लागत में उत्पादकता बढ़ाने वाली तकनीकें किसानों के लिए उपयोगी हो सकती हैं।

लेकिन अभी यह स्पष्ट नहीं है कि ₹500 करोड़ के अनुसंधान घटक के 419 प्रस्तावों में मध्यप्रदेश के कृषि विश्वविद्यालयों और अनुसंधान संस्थानों की कितनी परियोजनाएँ शामिल हैं।

यह भी सार्वजनिक रूप से स्पष्ट नहीं हुआ है कि प्रदेश के लिए प्रस्तावित शोध का विषय क्या है और मंजूरी मिलने के बाद उसके परिणाम किसानों तक किस माध्यम से पहुँचेंगे।

इन सवालों के जवाब मिलने पर मध्यप्रदेश के दलहन उत्पादकों के लिए मिशन के वास्तविक लाभ का आकलन करना आसान होगा।

15 नवंबर के बाद पता चलेगा अनुसंधान को कितनी रफ्तार मिली

मिशन दलहन आत्मनिर्भरता की सफलता केवल बजट के आकार से तय नहीं होगी। यह भी देखना होगा कि स्वीकृत राशि से कितने उपयोगी शोध शुरू होते हैं और उनके परिणाम किसानों तक कब पहुँचते हैं।

Financial Express की रिपोर्ट ने इस महत्वपूर्ण मुद्दे की ओर ध्यान दिलाया है कि मिशन के पहले वर्ष में अनुसंधान प्रस्तावों को औपचारिक मंजूरी नहीं मिली।

कैबिनेट सचिवालय की 15 नवंबर की समयसीमा अब अगले महत्वपूर्ण पड़ाव के रूप में सामने है।

कृषि मंत्रालय से यह स्पष्ट होना बाकी है कि कितने प्रस्तावों को अंतिम मंजूरी दी जाएगी, किस शोध संस्थान को कितनी राशि मिलेगी और किन फसलों या तकनीकों को प्राथमिकता दी जाएगी।

देश को दलहन उत्पादन में आत्मनिर्भर बनाने के लिए खेत का रकबा बढ़ाने के साथ वैज्ञानिक अनुसंधान, गुणवत्तापूर्ण बीज, फसल सुरक्षा और किसानों को उचित बाजार उपलब्ध कराना जरूरी होगा।

मिशन दलहन आत्मनिर्भरता के ₹500 करोड़ रिसर्च फंड, 419 प्रस्ताव और 350 लाख टन दलहन उत्पादन लक्ष्य का इंफोग्राफिक
मिशन दलहन आत्मनिर्भरता के तहत ₹500 करोड़ का रिसर्च फंड और 419 प्रस्तावों की मंजूरी में देरी। स्रोत: Financial Express और PIB।